ना कोई तारीफ मेरी, ना मुझमें कुछ खास
साईं के दर्शन की रखता हूं आस
इस दुनियावी चोले को गौरव कहते हैं लोग
साईं नाम जाप का पाया है सुयोग
जयपुर मे बाबा ने डलवाया है डेरा
यही बस सीधा सा परिचय है मेरा
बाबा ने हाथ पकडा और कृपा की अपार
इक साईं स्तुति की रचना करवाई अपरम्पार
मैं तो एक अदना सा प्राणी हूँ
न मेरा किस्सा न कहानी है
साई का जीवन साई ही के नाम है
साई साई रटता हूँ यही मेरा काम है
Friday, April 24, 2015
मेरा परिचय
Monday, April 20, 2015
मेरे मन का साँई
मेरे मन का साईं अक्सर चुप रहता है ,कुछ बोलता नही
बस साक्षी बना सब देखता है
लेकिन आज मेरे मन का साईं दुखी है.......बहुत दुखी
आज मेरे मन के साई के भीतर अश्रु का झरना फुट पडा है
मैंने पुछा कि साई क्या कारण है इसका तो मेरे मन का साई दुखी स्वर में बोला कि:-
मेरी बसायी इस प्यारी बगिया को न जाने क्या हो गया है, पुष्प की जगह अब कांटे उग आये है, एक पुष्प जरा खिला नही की उसे अभिमान हो गया कि उस जैसा कोई नही इस बगिया में,
एक फूल और सुगन्धित एवम् सुंदर फूल को तुच्छ समझने लगा जबकि साई की बगिया में तो सब फूल एक समान है कोई सुंदर है तो कोई सुगन्धित तो कोई पुष्प इतना विनीत की सदा झुक कर रहता है तो कोई तुरन्त खिल जाता है
सब पुष्प के अपने अपने गुण है
पर न जाने बगिया को क्या हुआ कि न अब यहाँ सींचने के लिए प्रेम रुपी जल है
और न ही अब बगिया ही है
बगिया ही छिन्न भिन्न है
ये बगिया नही एक व्यापार सा हो गया
हर पुष्प कहता है कि मैं साई का खास हूँ मैं ही उनके मस्तक पर चढ़ उनकी शोभा बढ़ाऊंगा
इस बात को लेकर पुष्पो में वाक् युद्ध छिड़ा है
पर कोई पुष्प यह नही कह रहा की मैं साई चरणों में अर्पित होऊँगा ताकि मैं विनम्र विनीत बनु मेरा अहंकार मिट जाये
आज सच मेरे मन का साई दुखी है
अगर मेरी भावनाये आप समझोगे तो आपके मन का साई भी दुखी होगा बहुत दुखी
Sunday, April 19, 2015
वैदिक ज्ञान
¶¶¶¶¶¶¶वैदिक ज्ञान¶¶¶¶¶¶¶
वेद व्यास रचित महाग्रंथों की कथायें कहने वाले
अनेक लोग हैं जो लोगों के बीच जाकर कथित रूप से
धर्म प्रचार करते हैं पर यह उनका धार्मिक अभियान
नहीं बल्कि व्यवसाय होता है। आत्मा और परमात्मा
के भेद को वह बयान जरूर करते हैं पर एक तोते की
तरह, जबकि तत्व ज्ञान को वह धारण नहीं किये
होते। कहने को किसी ने अपनी
पीठ बना ली है पर वह अपने और
परिवार के लिये संपत्ति बनाने के अलावा उनका कोई उद्देश्य
नहीं होता। ऐसे लोगों को सुनना तो चाहिये पर उनका
सुनकर स्वयं अपना ध्यान और मनन कर ज्ञान को धारण करें तो
ठीक रहेगा। उनको गुरु न मानकर अपने स्वाध्याय को
अपना गुरु बनायें।
कोई ढोंगी हो या पाखंडी यह तो समझ में
आ जाता है पर उन पर अधिक विचार न कर हमें अपना ध्यान
अपने इष्ट के स्मरण और ध्यान पर लगाना चाहिये। आत्मिक शांति
के लिये भक्ति मन में होना आवश्यक है और उसका दिखावा करने
का भाव जब हमारे अंदर आता है तो समझ लें कि हमारे किये
कराये पर पानी फिर रहा है। यह एकांत साधना है
और इस पर किसी से अधिक चर्चा करना
ठीक नहीं है। अंदर अपने इष्ट का
ध्यान कर जो आनंद प्राप्त होता है उसकी तो बस
अनुभूति ही की जा सकती
है।
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Saturday, April 18, 2015
साई सुप्रभातम्
साई अपनी आभा बरसाते बनके रवि
साई किरणों में पाप कट जाते है सभी
जिस पल बसा ली मन मन्दिर में साई छवि
मन का कोना कोना दिव्यमान हो जाता तभी
साई का तो गुण है गाते ये आसमा जमी
साई सबको है अपनाते न देखे कोई कमी
भूल के राग द्वेष बन जाओ साई प्रेमी
जिसका मन निर्मल हो साई रहते है वही
श्रद्धा सबूरी रखने वाला ही है साई पथगामी
जिसने साई महिमा पुरे दिल से है बखानी
साई माफ़ करता उसकी गलती उसकी नादानी
जिसने अपने मन में बैठे साई को पहचानी
साई उसकी जिव्हा में बसते बनके मधुर वाणी
Friday, April 17, 2015
साई सच्चा साथी
साई- सच्चा साथी
चलते चलते राहो में
हर राहगीर मुझे ऐसा मिला
कुछ दूर तक साथ निभाया
फिर वो भी चल निकला
यही तो जीवन का सच है
इसको मैं था यूह भूला
तन्हा हो गया था मैं
दे रहा खुद के खुद को शिकवा गला
तब ही आँखों में मेरे इक चमक दौड़ी
इक दिव्य आभा लिए
एक राहगीर और मिला
अब तक सबकी ऊँगली मैंने थामी थी
इस राहगीर ने मेरी ऊँगली थामी
पल भी देर लगी समझते मुझे
ये ही है राहगीर जो मुझे सच्चा मिला
मैंने पुछा कौन हो तुम
तो मन्द मुस्कान लिए वो बोला:-
रे प्यारे बच्चे न कर तू आँखों को गीला
मैं तो तेरा सदगुरू बाबा साई ही हूँ
तेरे दुष्कर्मो में तू था अब तक मुझे भूला
ये सुन मैं अश्रुविहिल हुआ
आँखे मेरी नम हुई पर शब्द इक न निकला
तब मुझे कुछ भी न सूझा
तुरन्त साई चरणो में मैं गिर पड़ा
साई ने मुझे उठाया लगाया गले
उन्होंने इक मधुर वचन बोला:-
नेक काज कर तू होगा तेरा भला
तब मुझे इस जीवन पथ का मर्म समझ आया
सदगुरू साई के इक इक शब्द ने
मेरे तन मन जीवन में मधुर रस घोला
दिन आरम्भ
साई नाम से हो आज दिन आरम्भ
तज के सारे अभिमान और दम्भ
ताकि पल में दुःख दर्द गम हो कम
विनम्र बन साई चरणों में झुके रहे हरदम
Sunday, April 12, 2015
श्री साई सुप्रभात
ॐ श्री साई सुप्रभात
मुख पर हो साई की बात
साई ही है मेरे दिल के सम्राट
पाना चाहूँ मैं सदा साई का साथ
चन्द्र सम शीतलता लिए आया वार सोम
आज साई गुणगान करेगा मेरा रोम रोम
नूर दमकता आज जिनका वो है साई ओम
जिनका बखान करते ये धरती ये व्योम