Wednesday, May 6, 2015

आज का वैदिक ज्ञान

¶¶¶¶¶वैदिक ज्ञान¶¶¶¶¶

हम गणेश जी यानि गणपति जी की सबसे पहले पूजा करते है उनका ही नाम ले कार्य आरम्भ करते है तो "गणपति" का अर्थ जानते है क्या होता है ?

"गणपति" हमारे इन्द्रियों का गण है..
और इस इन्द्रियों के गण का पति हमारा 'मन' है...
कोनसा भी कार्य सफल करना है तो अपना 'मनरूपी
गणपति' स्थिर होना चाहिए.. चंचल नही..!
इसलिए गणपति जी को प्रथम पूजने का अर्थ ये है
की... अपने मन को कार्य के प्रारम्भ में शांत, स्थिर
रखो... जिस के वजह से कार्य में कोई बाधा ना आये..
और कार्य सफलता पूर्वक हो..!
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श्री साई वार

श्री साई गुरूवार अति पुनीत पावन
साई नाम से खिलता मन का सावन
साई वार करे आज रहमत की बरसात
इस भव में साँई नाम लेकर रहे सब साथ
सांई का वार लाये खुशियो की सौगाते
सांई नाम लेकर तो गूँगे भी साई साई गाते
सांई सदगुरू का आज आया है श्री वार
साँई पर सब छोड़ दो वो देंगे मातृ सम दुलार
साँई श्री वार से कर नेकी के काज आरम्भ
ताकि साँई तुझे विनीत बनाये मिटाये तेरा दम्भ
साँई वार पर आज साई को ध्या लो शपथ
तज देंगे हम सभी आज से ही छल झूठ कपट
आज साई वार पर बने हमारा एक परिवार
जिसमे सब मिलके रहे और करे सद्व्यवहार
आराध्य साँई से अब है यही प्रार्थना
हम बच्चो का साँई तू ही हाथ थामना

Sunday, May 3, 2015

आज का वैदिक ज्ञान

¶¶¶¶¶¶ वैदिक ज्ञान ¶¶¶¶¶¶

वह इंसान जो अध्यात्म के मार्ग पर
है उसके लिए बुद्ध पूर्णिमा एक बड़ा
महत्वपूर्ण दिन है। सूर्य का चक्कर
लगाती पृथ्वी जब सूर्य के उत्तरी
भाग में चली जाती है तो उसके बाद
यह तीसरी पूर्णिमा होती है।
गौतम बुद्ध की याद में इसका नाम
उनके नाम पर रखा गया है।
बुद्ध पूर्णिमा को गौतम बुद्ध के
ज्ञान प्राप्ति के दिन के रूप में
देखा जाता है। करीब आठ साल की
घनघोर साधना के बाद गौतम बहुत
कमजोर हो गए थे। चार साल तक वह
समाना (श्रमण) की स्थिति में रहे।
समाना (श्रमण) के लिए मुख्य
साधना बस घूमना और उपवास
रखना था, वे कभी भोजन की
तलाश नहीं करते थे। इससे गौतम का
शरीर इतना कमजोर हो गया कि वह
मौत के काफी करीब पहुंच गए। इस
दौरान वह निरंजना नदी के पास
पहुंचे, जो प्राचीन भारत की कई
नदियों की तरह सूख चुकी है और
लगभग विलुप्त हो चुकी है। उस वक्त
यह नदी एक बड़ी जलधारा थी,
जिसमें घुटनों तक पानी तेज गति से
बह रहा था। गौतम ने नदी पार करने
की कोशिश की, लेकिन आधे रास्ते
में ही उन्हें इतनी कमजोरी महसूस हुई
कि उन्हें लगा कि अब एक कदम भी
आगे बढ़ा पाना संभव नहीं है।
लेकिन वह हार मानने वाले शख्स
नहीं थे। उन्होंने वहां पड़ी पेड़ की
एक शाखा को पकड़ लिया और बस
ऐसे ही खड़े रहे।
कहा जाता है कि इसी अवस्था में गौतम
घंटों खड़े रहे। हो सकता है, वह कई घंटे खड़े
रहे हों। यह भी हो सकता है कि वे कुछ पल
ही खड़े रहे हों, जो कमजोरी की ऐसी
हालत में घंटों जैसे लग सकते हैं। उस पल उन्हें
अहसास हुआ कि वह जो खोज रहे हैं, वह
तो उनके भीतर ही है। फिर ये सब संघर्ष
करने का क्या फायदा! जिस चीज की
आवश्यकता है, वह है अपने भीतर पूर्ण रूप से
राजी हो जाना और ऐसा तो यहीं और
अभी हो सकता है। फिर मैं उसे पूरी
दुनिया में खोजता क्यों घूम रहा हूं? जब
उन्हें इस बात का अहसास हुआ, तो उन्हें
हिम्मत और ताकत मिली और उन्होंने
एक-एक कदम आगे बढ़ाते हुए नदी पार कर
ली। इसके बाद वह एक पेड़ के नीचे बैठ गए,
जिसे अब बोधि वृक्ष के नाम से जाना
जाता है। वह इस पेड़ के नीचे इस संकल्प के
साथ बैठे – ‘जब तक मुझे परम ज्ञान की
प्राप्ति नहीं होती, मैं यहां से नहीं
उठूंगा। या तो मैं यहां से एक प्रबुद्ध
व्यक्ति के रूप में उठूंगा या फिर इसी
अवस्था में प्राण त्याग दूंगा।’ और एक ही
पल में उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हो गई,
क्योंकि इसके लिए बस इसी चीज की
जरूरत होती है
जो चीज आप चाहते हैं, वह आपकी
प्राथमिकता बन जानी चाहिए।
फिर वह एक पल में हो जाती है। पूरी
साधना, पूरी कोशिश बस इसी के
लिए होती है। चूंकि लोग इधर उधर
इतने बिखरे हुए और अस्त व्यस्त हैं कि
उन्हें एकत्रित करने और एक समग्र
इकाई बनाने में बहुत लंबा समय लग
जाता है। ये लोग अपनी पहचान
तमाम चीजें के साथ बना लेते हैं।
इसलिए पहली चीज है, खुद को
समेटना। अगर इस इंसान को हमने एक
समग्र इकाई के रूप में पूरी तरह से समेट
लिया, तभी हम उसके साथ कुछ कर
सकते हैं।
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साधू कौन ?

: कुछ दिनो पूर्व एक जगह  ं
मैंने अजब दृश्य देखा। दो साधु एक कुत्ते को डंड़े और तालों से मार
रहे थे। कारण पूछा तो पता चला वह
कुत्ता उनकी रोटी लेकर भागा था। नित्य
धार्मिक अनुष्ठान करने वाले, प्रभु की जय-जयकार
करने वाले और जीवन में आए सुख-दुख को, 'होय
वही जो राम रच राखा' कहकर संबल देने वाले साधु
अगले ही पल
अपनी रोटी छिन जाने से व्यथित हो उठे थे।
इतने, कि हिंसक हो गए। स्वयं पर विपदा आई तो हर वस्तु और
प्राणी में भगवान को देखने का प्रवचन देने वाले साधुओं
को कुत्ते में भगवान नहीं दिखे। इस आचरण से एक
बार फिर यह सिद्ध हुआ कि कोई व्यक्ति सर्वप्रथम मन से
अर्थात हृदय से साधु-सन्यासी होता है, उसके बाद
कर्म से साधु-सन्यासी होता है और, सबसे अंत में
वचन से साधु-सन्यासी होता है, किन्तु केवल
वेशभूषा से वह कदापि साधु-
सन्यासी नहीं हो सकता।

Saturday, May 2, 2015

साई संजीवनी

प्राण पखेरू कब के उड़ गए होते मेरे
अगर साँई तुम न बनते मेरी संजीवनी
कैसे बयाँ करूँ मैं आपकी लीलाओ को
आपकी लीला अनमोल है जैसे पारस मणि

मैं तो एक अदना सा प्राणी हूँ
न मेरा किस्सा न कहानी है
साई का जीवन साई ही के नाम है
साई साई रटता हूँ यही मेरा काम है

साई तेरी रहमत की हुई प्रभात
और दूर हुई गमो की यामिनी
तुझे जब से मेरे मन में बसाया
मेरा मन बन गया मंदाकिनी

तेरे चरणों से हे इष्ट मैं ऐसे लिपटू
जैसे चन्दन वृक्ष से लिपटता सर्प
माना हूँ मैं तो तेरा दास अज्ञानी
तेरी शरण में आऊं समझूँ जीवन मर्म

श्रीकृष्ण उपदेश

भगवान कृष्ण ने गीता के नवें अध्याय के २९वें श्लोक
में कहा है :--
"समोहम सर्वभूतेषु न में द्वेश्योस्तिन प्रिय: ये
भजन्ति तु मां भक्तयां मई तें तेषु "
अनुवाद इस प्रकार है -----मैं सब भूतों में समभाव से
व्यापत हूँ ,ना कोई मेरा प्रिय है ना अप्रिय है परंतु
जो भक्त मुझको प्रेम से भजते है वे मुझमें है और मैं
भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट हूँ ।

साँई गुणातीत थे और गुणातीत ब्रहम स्वरूप ही है ।

भगवान कृष्ण ने गीता के १४वें अध्याय के २४वें श्लोक
में वर्णन किया है :--
"जो निरन्तर आत्म भाव में स्तिथ ,दुख-सुख
को समान समझने वाला ,मिट्टी,पत्थर और स्वर्ण में
समान भाव वाला ज्ञानी ,प्रिय तथा अप्रिय
को एक-सा मानने वाला अपनी निंन्दा स्तुति में
भी समान भाव वाला है|
फिर २५वें श्लोक में पूर्ण किया:--
जो मान अपमान में सम है ,मित्र और बैरी पक्ष में
भी सम है एवं सम्पूर्ण आरम्भो में अभिमान से रहित
है , व्ह पुरुष गुणातीत कहा जाता है |
और फिर २६वें श्लोक में पूर्ण किया :---
जो पुरुष अव्यभिचारी भक्ति योग
द्वारा मुझको निरंतर भजता है , वह भी इन
तीनो गुणो को भलीं-भातिं लांघकर
सच्चिदाननद्घन ब्रहम को प्राप्त होने योग्य बन
जाता है |
" मेरा साँई जब तक देह में विराजमान था
तब तक पूर्ण योगी था,प्रेम स्वरूप था
देह त्याग कर गुणातीत ब्रहम में व्याप्त हो गया |"

Friday, May 1, 2015

सत्य

सत्य देखना चाहे ये अंखियन
तभी वाणी भी सत्य करे वदन
जिस पल गलत का साथ दे ये दास
उस दिन रौंद दिया जाऊ मैं बनके घास
वाक् पटु भी ये हो जाये तब नष्ट
हाथो को लकवा मारे हो मुझे कष्ट
पर हे साई अगर मैं रहूँ सच्चा बन्दा
सत्य देखूँ न बनू धृतराष्ट्र सम अँधा
तो प्रभुवर आप देना मेरा पूर्ण साथ
मस्तक पर रखके आपके करुणामयी हाथ
ताकि सही की रक्षा कर सकु पूर्ण भाव से
घरौंदा बना सकु आपकी ममता की छाँव से
जिस घरौंदे में रहे आपके सब दास
जो सबूरी संग रखे आप पर पूर्ण विश्वास
बन जाये सब आपके बच्चे ख़ास