श्री साई सच्चरित्र अध्याय 4
अध्याय 4 - श्री साई बाबा का शिरडी में प्रथम आगमन
सन्तों का अवतार कार्य, पवित्र तीर्थ शिरडी, श्री साई बाबा
का व्यक्तित्व, गौली बुवा का अनुभव, श्री विटठल का प्रगट
होना, क्षीरसागर की कथा, दासगणु का प्रयाग – स्नान, श्री
साई बाबा का शिरडी में प्रथम आगमन, तीन वाडे़ ।
सन्तों का अवतार कार्य
भगवद्गगीता (चौथा अध्याय 7-8) में श्री कृष्ण कहते है कि जब जब
धर्म की हानि और अधर्म की वृदि होता है, तब-तब मैं अवतार
धारण करता हूँ । धर्म-स्थापन दुष्टों का विनाश तथा साधुजनों के
परित्राण के लिये मैं युग-युग में जन्म लेता हूँ । साधु और संत भगवान
के प्रतिनिधिस्वरुप है । वे उपयुक्त समय पर प्रगट होकर अपनी
कार्यप्रणाली दृारा अपना अवतार-कार्य पूर्ण करते है । अर्थात्
जब ब्राहमण, क्षत्रिय और वैश्य अपने कर्तव्यों में विमुख हो जाते है,
जब शूद्र उच्च जातियों के अधिकार छीनने लगते है, जब धर्म के
आचार्यों का अनादर तथा निंदा होने लगती है, जब धार्मिक
उपदेशों की उपेक्षा होने लगती है, जब प्रत्येक व्यक्ति सोचने
लगता है कि मुझसे श्रेष्ठ विदृान दूसरा नहीं है, जब लोग निषिदृ
भोज्य पदार्थों और मदिरा आदि का सेवन करने लगते है, जब धर्म
की आड़ में निंदित कार्य होने लगते है, जब भिन्न-भिन्न
धर्मावलम्बी परस्पर लड़ने लगते है, जब ब्राहमण संध्यादि कर्म छोड़
देते है, कर्मठ पुरुषों को धार्मिक कृत्यों में अरुचि उत्पन्न हो जाती
है, जब योगी ध्यानादि कर्म करना छोड़ देते हें और जब
जनसाधारण की ऐसी धारणा हो जाती है कि केवल धन, संतान
और स्त्री ही सर्वस्व है तथा इस प्रकार जब लोग सत्य-मार्ग से
विचलित होकर अधःपतन की ओर अग्रसर होने लगते है, तब संत प्रगट
होकर अपने उपदेशों एवं आचरण के दृारा धर्म की संस्थापन करते हैं ।
वे समुद्र की तरह हमारा उचित मार्गदर्शन करते तथा सत्य पथ पर
चलने को प्रेरित करते है । इसी मार्ग पर अनेकों संत-निवृत्तिनाथ,
ज्ञानदेव, मुक्ताबाई, नामदेव, गोरा, गोणाई, एकनाथ, तुकाराम,
नरहरि, नरसी भाई, सजन कसाई, सावंत माली और रामदास तथा
कई अन्य संत सत्य-मार्ग का दिग्दर्शन कराने के हेतु भिन्न-भिन्न
अवसरों पर प्रकट हुए और इन सब के पश्चात शिरडी में श्री साई
बाबा का अवतार हुआ ।
पवित्र तीर्थ शिरडी
अहमदनगर जिले में गोदावरी नदी के तट बड़े ही भाग्यशाली है,
जिन पर अनेक संतों ने जन्म धारण किया और अनेकों ने वहाँ आश्रय
पाया । ऐसे संतों में श्री ज्ञानेश्रर महाराज प्रमुख थे । शिरडी,
अहमदनगर जिले के कोपरगाँव तालुका में है । गोदावरी नदी पार
करने के पश्चात मार्ग सीधा शिरडी को जाता है । आठ मील चलने
पर जब आर नीमगाँव पहुँचेंगे तो वहाँ से शिरडी दृष्टिगोचर होने
लगती है । कृष्णा नदी के तट पर अन्य तीर्थस्थान गाणगापूर,
नरसिंहवाडी और औदुम्बर के समान ही शिरडी भी प्रसिदृ तीर्थ है
। जिस प्रकार दामाजी ने मंगलवेढ़ा को (पंढरपुर के समीर), समर्थ
रामदास ने सज्जनगढ़ को, दत्तावतार श्रीनरसिंह सरस्वती ने
वाड़ी को पवित्र किया, उसी प्रकार श्री साईनाथ ने शिरडी में
अवतीर्ण होकर उसे पावन बनाया ।
श्री साई बाबा का व्यक्तित्व
श्री साई बाबा के सानिध्य से शिरडी का महत्व विशेष बढ़ गया ।
अब हम उनके चरित्र का अवलोकन करेंगे । उन्होंने इस भवसागर पर
विजय प्राप्त कर ली थी, जिसे पार करना महान् दुष्कर तथा
कठिन है । शांति उनका आभूषण था तथा वे ज्ञान की साक्षात
प्रतिमा थे । वैष्णव भक्त सदैव वहाँ आश्रय पाते थे । दानवीरों में वे
राजा कर्ण के समान दानी थे । वे समस्त सारों के साररुप थे ।
ऐहिक पदार्थों से उन्हें अरुचि थी । सदा आत्मस्वरुप में निमग्न रहना
ही उनके जीवन का मुख्य ध्येय था । अनित्य वस्तुओं का आकर्षण
उन्हें छू भी नहीं गयी थी। उनका हृदय शीशे के सदृश उज्जवल था ।
उनके श्री-मुख से सदैव अमृत वर्षा होती थी । अमीर और गरीब उनके
लियो दोंनो एक समान थे । मान-अपमान की उन्हें किंचितमात्र
भी चिंता न थी । वे निर्भय होकर सम्भाषण करते, भाँति-भाँति
के लोंगो से मिलजुलकर रहते, नर्त्तिकियों का अभिनय तथा नृत्य
देखते औरगजन-कव्वालियाँ भी सुनते थे । इतना सब करते हुए भी
उनकी समाधि किंचितमात्र भी भंग न होती थी । अल्लाह का
नाम सदा उलके ओठों पर था । जब दुनिया जागती तो वे सोते और
जब दुनिया सोती तो वे जागते थे । उनका अन्तःकरण प्रशान्त
महासागर की तरह शांत था । न उनके आश्रम का कोई निश्चय कर
सकता था और न उनकी कार्यप्रणाली का अन्त पा सकता था ।
कहने के लिये तो वे एक स्थान पर निवास करते थे, परंतु विश्व के
समस्त व्यवहारों व व्यापारों का उन्हें भली-भाँति ज्ञान था ।
उनके दरबार का रंग ही निराला था । वे प्रतिदिन अनेक
किवदंतियाँ कहते थे, परंतु उनकी अखंड शांति किंचितमात्र भी
विचलित न होती थी । वे सदा मसजिद की दीवार के सहारे बैठे
रहते थे तथा प्रातः, मध्याहृ और सायंकील लेंडी और चावडड़ी की
ओर वायु-सोवन करने जाते तो भी सदा आत्मस्थ्ति ही रहते थे ।
स्वतः सिदृ होकर भी वे साधकों के समान आचरण करते थे । वे
विनम्र, दयालु तथा अभिमानरहित थे । उन्होंने सबको सदा सुख
पहुँचाया । ऐसे थे श्री साईबाबा, जिनके श्री-चरणों का स्पर्श कर
शिरडी पावन बन गई । उसका महत्व असाधारण हो गया । जिस
प्रकार ज्ञानेश्वर ने आलंदी और एकनाथ ने पैठण का उत्थान
किया, वही गति श्री साईबाबा दृारा शिरडी को प्राप्त हुई ।
शिरडी के फूल, पत्ते, कंकड़ और पत्थर भी धन्य है, जिन्हें श्री साई
चरणाम्बुजों का चुम्बन तथा उनकी चरण-रज मस्तक पर धारण करने
का सौभाग्य प्राप्त हुआ । भक्तगण को शिरडी एक दूसरा पंढरपुर,
जगत्राथपुरी, दृारका, बनारस (काशी), महाकालेश्वरतथा गोकर्ण
महाबलेश्वर बन गई । श्री साई का दर्शन करना ही भक्तों का
वेदमंत्र था, जिसके परिणामस्वरुप आसक्ति घटती और आत्म दर्शन
का पथ सुगम होता था । उनका श्री दर्शन ही योग-साधन था और
उनसे वार्तालाप करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते थे । उनका
पादसेवन करना ही त्रिवेणी (प्रयाग) स्नान के समान था तथा
चरणामृत पान करने मात्र से ही समस्त इच्छाओं की तृप्ति होती
थी । उनकी आज्ञा हमारे लिये वेद सदृश थी । प्रसाद तथा उदी
ग्रहण करने से चित्त की शुदृि होता थी । वे ही हमारे राम और
कृष्ण थे, जिन्होंने हमें मुक्ति प्रदान की, वे ही हमारे परब्रहमा थे ।
वे छन्दों से परे पहते तथा कभी निराश व हताश नहीं होते थे । वे
सदा आत्म-स्थित, चैतन्यघन तथा आनन्द की मंगलमूर्ति थे । कहने
को तो शिरडी उनका मुख्य केन्द्र था, परन्तु उनका कार्यक्षेत्र
पंजाब, कलकत्ता, उत्तरी भारत, गुजरात, ढाका और कोकण तक
विस्तृत था । श्री साईबाबा की कीर्ति दिन-प्रतिदिन चहुँ ओर
फैलने लगी और जगह-जगह से उनके दर्शनार्थ आकर भक्त लाभ उठाने
लगे । केवल दर्शन से ही मनुष्यों, चाहे वे शुदृ अथवा अशुदृ हृदय के हों, के
चित्त को परम शांति मिल जाती थी । उन्हें उसी आनन्द का
अनुभव होता था, जैसा कि पंढरपुर में श्री विटठल के दर्शन से होता
है । यह कोई अतिशयोक्ति नहीं है । दोखिये, एक भक्त ने यही
अनुभव पाया है –
गौली बुवा
लगभग 95 वर्ष के वयोवृदृ भक्त, जिनका नाम गौली बुवा था,
पंढरी के एक वारकरी थे । वे 8 मास पंढरपुर तथा 4 मास (आषाढ़ से
कार्तिक तक) गंगातट पर निवास करते थे । सामान ढोने के लिये वे
एक गधे को अपने पास रखते और एक शिष्य भी सदैव उनके साथ रहता
था । वे प्रतिवर्ष वारी लेकर पंढरपुर जाते और लौटते सैय श्री
बाबा के दर्शनार्थ शिरडी आते थे । बाबा पर उनका अगाध प्रेम
था । वे बाब की ओर एक टक निहारते और कह उठते थे कि ये तो
श्री पंढरीनाथ, श्री विटठल के अवतार है, जो अनाथ-नाथ, दीन
दयालु और दीनों के नाथ है । गौली बुवा श्री विठोबा के परम
भक्त थे । उन्होंने अनेक बार पंढरी की यात्रा की तथा प्रत्यक्ष
अनुभव किया कि श्री साई बाबा सचमुच में ही पंढरीनाथ हैं ।
विटठल स्वयं प्रकट हुए
श्री साई बाबा की ईश्वर-चिंतन और भजन में विशेष अभिरुचि थी
। वे सदैव अल्लाह मालिक पुकारते तथा भक्तों से कीर्तन-सप्ताह
करवाते थे । इसे नामसप्ताह भी कहते है । एक बार उन्होंने दासगणू
को कीर्तन-सप्ताह करने की आज्ञा दी । दासगणू ने बाबा से
कहा कि आपकी आज्ञा मुझे शिरोधार्य है, परन्तु इस बात का
आश्वासन मिलना चाहिये कि सप्ताह के अंत में विटठल भगवान्
अवश्य प्रगट होंगे । बाबा ने अपना हृदय स्पर्श करते हुए कहा कि
विटठल अवश्य प्रगट होंगे । परन्तु साथ ही भक्तों मे श्रदृा व तीव्र
उत्सुकता का होना भी अनिवार्य है । ठाकुर नाथ की डंकपुरी,
विटठल की पंढरी, पणछोड़ की दृारका यहीं तो है । किसी को
दूर जाने की आवश्यकता नहीं है । क्या विटठल कहीं बाहर से आयेंगे
। वे तो यहीं विराजमान हैं । जब भक्तों में प्रेम और भक्ति का
स्त्रोत प्रवारित होगा तो विटठल स्वयं ही यहाँ प्रगट हो जायेंगे
।
सप्ताह समाप्त होने के बाद विटठल भगवान इस प्रकार प्रकट हुस ।
काकासाहेब दीक्षित सदाव की भाँति स्नान करने के पश्चात
जब ध्यान करने को बैठे तो उन्हें विटठल के दर्शन हुए । दोपहर के समय
जब वे बाबा के दर्शनार्थ मसजिद पहुँचे तो बाबा ने उनसे पूछा क्यों
विटठल पाटील आये थे न । क्या तुम्हें उनके दर्शन हुए । वे बहुत चंचल हैं
। उनको दृढ़ता से पकड़ लो । यदि थोडी भी असावधानी की तो
वे बचकर निकल जायेंगे । यह प्रातःकाल की घटना थी और दोपहर
के समय उन्हें पुनः दर्शन हुए । उसी दिन एक चित्र बेचने वाला
विठोबा के 25-30 चित्र लेकर वहाँ बेचने को आया । यह चित्र
ठीक वैसा ही था, जैसा कि काकासाहेब दीक्षित को ध्यान में
दर्शन हुए थे । चित्र देखकर और बाबा के शब्दों का स्मरण कर
काकासाहेब को बड़ा विस्मय और प्रसन्नता हुई । उन्होंने एक
चित्र सहर्ष खरीद लिया और उसे अपने देवघर में प्रतिष्ठित कर
दिया ।
ठाणा के अवकाशप्राप्त मामलतदार श्री. बी.व्ही.देव ने अपने
अनुसंधान के दृारा यह प्रमाणित कर दिया है कि शिरडी पंढरपुर
की परिधि में आती है । दक्षिण में पंढरपुर श्री कृष्ण का प्रसिदृ
स्थान है, अतः शिरडी ही दृारका है । (साई लीला पत्रिका
भाग 12, अंक 1,2,3 के अनुसार)
दृारका की एक और व्याख्या सुनने में आई है, जो कि कै.नारायण
अय्यर दृारा लिखित भारतवर्ष का स्थायी इतिहास में
स्कन्दपुराण (भाग 2, पृष्ठ 90) से उदृत की गई है । वह इस प्रकार है –
“चतुर्वर्णामपि वर्गाणां यत्र द्घराणि सर्वतः ।
अतो दृारवतीत्युक्ता विद़दि्भस्तत्ववादिभिः ।।“
जो स्थान चारों वर्णों के लोगों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष
के लिये सुलभ हो, दार्शनिक लोग उसे दृारका के नाम से पुकारते है ।
शिरडी में बाबा की मसजिद केवल चारों वर्णों के लिये ही नहीं,
अपितु दलित, अस्पृश्य और भागोजी सिंदिया जैसे कोढ़ी आदि
सब के लिये खुली थी । अत- शिरडी को दृारका कहना सर्वथा
उचित है ।
भगवंतराव क्षीरसागर की कथा
श्री विटठल पूजन में बाबा को कितनी रुचि थी, यह भगवंतराव
क्षीरसागर की कथा से सपष्ट है । भगवंतराव को पिता विठोबा
के परम भक्त थे, जो प्रतिवर्ष पंढरपुर को वारी लेकर जाते थे । उनके
घर में एक विठोबा की मूर्ति थी, जिसकी वे नित्यप्रति पूजा करते
थे । उनकी मृत्यु के पश्चात् उनके पुत्र भगवंतराव ने वारी, पूजन श्रादृ
इत्यादि समस्त कर्म करना छोड़ दिया । जब भगवंतराव शिरडी
आये तो बाबा उन्हें देखते ही कहने लगे कि इनके पिता मेरे परम मित्र
थे । इसी कारण मैंने इन्हें यहाँ बुलाया हैं । इन्होंने कभी नैवेघ अर्पण
नहीं किया तथा मुझे और विठोबा को भूखों मारा है । इसलिये
मैंने इन्हें यहां आने को प्रेरित किया है । अब मैं इन्हें हठपूर्वक पूजा में
लगा दूंगा ।
दासगणू का प्रयाग स्नान
गंगा और यमुनग नदी के संगम पर प्रयाग एक प्रसिदृ पवित्र
तीर्थस्थान है । हिन्दुओं की ऐसी भावना है कि वहाँ स्नानादि
करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते है । इसीकारण प्रत्येक पर्व पर
सहस्त्रों भक्तगण वहाँ जाते है और स्नान का लाभ उठाते है । एक
बार दासगणू ने भी वहाँ जाकर स्नान करने का निश्चय किया । इस
विचार से वे बाबा से आज्ञा लेने उनके पास गये । बाबा ने कहा
कि इतनी दूर व्यर्थ भटकने की क्या आवष्यकता है । अपना प्रयाग
तो यहीं है । मुझ पर विश्वास करो । आश्चर्य । महान् आश्चर्य । जैसे
ही दासगणू बाबा के चरणों पर नत हुए तो बाबा के श्री चरणों से
गंगा-यमुना की धारा वेग से प्रवाहित होने लगी । यह चमत्कार
देखकर दासगणू का प्रेम और भक्ति उमड़ पड़ी । आँखों से अश्रुओं की
धारा बहने लगी । उन्हें कुछ अंतःस्फूर्ति हुई और उनके मुख से श्री
साई बाबा की स्त्रोतस्विनी स्वतःप्रवाहित होने लगी ।
श्री साई बाबा की शिरडी में प्रथम आगमन
श्री साई बाबा के माता पिता, उनके जन्म और जन्म-स्थान का
किसी को भी ज्ञान नहीं है । इस सम्बन्ध में बहुत छानबीन की गई
। बाबा से तथा अन्य लोगों से भी इस विषय में पूछताछ की गई,
परन्तु कोई संतोषप्रद उत्तर अथवा सूत्र हाथ न लग सका । यथार्थ में
हम लोग इस विषय में सर्वथा अनभिज्ञ हैं । नामदेव और कबीरदास
जी का जन्म अन्य लोगों की भाँति नहीं हुआ था । वे बाल-रुप में
प्रकृति की गोद में पाये गये थे । नामदेव भीमरथी नदी के तीर पर
गोनाई को और कबीर भागीरथी नदी के तीर पर तमाल को पड़े
हुए मिले थे और ऐसा ही श्री साई बाबा के सम्बन्ध में भी था । वे
शिरडी में नीम-वृक्ष के तले सोलह वर्ष कीकी तरुणावस्था में स्वयं
भक्तों के कल्याणार्थ प्रकट हुए थे । उस समय भी वे पूर्ण
ब्रहृज्ञानी प्रतीत होते थे । स्वपन में भी उनको किसी लौकिक
पदार्थ की इच्छा नहीं थी । उन्होंने माया को ठुकरा दिया था
और मुक्ति उनके चरणों में लोटता थी । शिरडी ग्राम की एक वृदृ
स्त्री नाना चोपदार की माँ ने उनका इस प्रकार वर्णन किया है-
एक तरुण, स्वस्थ, फुर्तीला तथा अति रुपवान् बालक सर्वप्रथम नीम
वृक्ष के नीचे समाधि में लीन दिखाई पड़ा । सर्दी व गर्मी की उन्हें
किंचितमात्र भी चिंता न थी । उन्हें इतनी अल्प आयु में इस प्रकार
कठिन तपस्या करते देखकर लोगों को महान् आश्चर्य हुआ । दिन में
वे किसी से भेंट नहीं करते थे और रात्रि में निर्भय होकर एकांत में
घूमते थे । लोग आश्चर्यचकित होकर पूछते फिरते थे कि इस युवक का
कहाँ से आगमन हुआ है । उनकी बनावट तथा आकृति इतनी सुन्दर थी
कि एक बार देखने मात्र के ही लोग आकर्षित हो जाते थे । वे सदा
नीम वृक्ष के नीचे बैठे रहते थे और किसी के दृार पर न जाते थे ।
यघपि वे देखने में युवक प्रतीत होते थे, परन्तु उनका आचरण
महात्माओं के सदृश था । वे त्याग और वैराग्य की साक्षात
प्रतिमा थे । एक बार एक आश्चर्यजनक घटना हुई । एक भक्त को
भगवान खंडोबा का संचार हुआ । लोगों ने शंका-निवारार्थ उनसे
प्रश्न किया कि हे देव कृपया बतलाइये कि ये किस भाग्यशाली
पिता की संतान है और इनका कहाँ से आगमन हुआ है । भगवान
खंडोबा ने एस कुदाली मँगवाई और एक निर्दिष्ट स्थान पर खोदने
का संकेत किया । जब वह स्थान पूर्ण रुप से खोदा गया तो वहाँ
एक पत्थर के नीचे ईंटें पाई गई । पत्थर को हटाते ही एक दृार दिखा,
जहाँ चार दीप जल रहे थे । उन दरवाजों का मार्ग एक गुफा में
जाता था, जहाँ गौमुखी आकार की इमारत, लकड़ी के तखते,
मालाऐं आदि दिखाई पड़ी । भगवान खंडोबा कहने लगे कि इस
युवक ने इस स्थान पर बारह साल तपस्या की है । तब लोग युवक से
प्रश्न करने लगे । परंतु उसने यह कहकर बात टाल दी कि यह मेरे श्री
गुरुदेव की पवित्र भूमि है तथा मेरा पूज्य स्थान है और लोगों से उस
स्थान की भली-भांति रक्षा करने की प्रार्थना की । तब लोगों
ने उस दरवाजे को पूर्ववत् बन्द कर दिया । जिस प्रकार अश्वत्थ
औदुम्बर वृक्ष पवित्र माने जाते है, उसी प्रकार बाबा ने भी इस
नीम वृक्ष को उतना ही पवित्र माना और प्रेम किया ।
म्हालसापति तथा शिरडी के अन्य भक्त इस स्थान को बाबा के
गुरु का समाधि-स्थान मानकर सदैव नमन किया करते थे ।
तीन वाडे़
नीम वृक्ष के आसपास की भूमि श्री हरी विनायक साठे ने मोल
ली और उस स्थान पर एक विशाल भवन का निर्माण किया,
जिसका नाम साठे-वाड़ा रखा गया । बाहर से आने वाले
यात्रियों के लिये वह वाड़ा ही एकमात्र विश्राम स्थान था,
जहाँ सदैव भीड़ रहा करती थी । नीम वृक्ष के नीचे चारों ओर
चबूतरा बाँधा गया । सीढ़ियों कके नीचे दक्षिण की ओर एक
छोटा सा मन्दिर है, जहाँ भक्त लोग चबूतरे के ऊपर उत्तराभिमुख
होकर बैठते है । ऐसा विश्वास किया जाता है कि जो भक्त
गुरुवार तथा शुक्रवार की संध्या को वहाँ धूप, अगरबत्ती आदि
सुगन्धित पदार्थ जलाते है, वे ईश-कृपा से सदैव सुखी होंगे । यह
वाड़ा बहुत पुराना तथा जीर्ण-शीर्ण स्थिति में था तथा इसके
जीर्णोंदृार की नितान्त आवश्यकता थी, जो संस्थान दृारा पूर्ण
कर दी गई । कुछ समय के पश्चात एक दितीय वाड़े का निर्माण
हुआ, जिसका नाम दीक्षित-वाड़ा रखा गया । काकासाहेब
दीक्षित, कानूनी सलाहकार (Solicitor) जब इंग्लैंड में थे, तब वहाँ
उन्हें किसी दुर्घटना से पैर में चोट आ गई थी । उन्होंने अनेक उपचार
किये, परंतु पैर अच्छा न हो सका । नानासाहेब चाँदोरकर ने उन्हें
बाबा की कृपा प्राप्त करने का परामर्श दिया । इसलिये उन्होंने
सन् 1909 में बाबा के दर्शन किये । उन्होंने बाबा से पैर के बदले अपने
मन की पंगुता दूर करने की प्रार्थना की । बाबा के दर्शनों से उन्हें
इतना सुख प्राप्त हुआ कि उन्होंने स्थायी रुप से शिरडी में रहना
स्वीकार कर लिया और इसी कारण उन्होंने अपने तथा भक्तों के
हेतु एक वाड़े का निर्माण कराया । इस भवन का शिलान्यास
दिनांक 9-12-1910 को किया गया । उसी दिन अन्य दो विशेष
घटनाएँ घटित हुई –
श्री दादासाहेब खापर्डे को घर वापस लौटने की अनुमति प्राप्त
हो गई और
चावड़ी में रात्रि को आरती आरम्भ हो गई । कुछ समय में वाड़ा
सम्पूर्ण रुप से बन गया और रामनवमी (1911) के शुभ अवसर पर उसका
यथाविधि उद्घाटन कर दिया गया । इसके बाद एक और वाड़ा-
मानो एक शाही भवन-नागपुर के प्रसिदृ श्रीमंत बूटी ने बनवाया ।
इस भवन के निर्माण में बहुत धनराशि लगाई गई । उनकी समस्त
निधि सार्थक हो की, क्योंकि बाबा का शरीर अब वहीं
विश्रान्ति पा रहा है और फिलहाल वह समाधि मंदिर के नाम से
विख्यात है इस मंदिर के स्थान पर पहले एक बगीचा था, जिसमें
बाबा स्वयं पौधौ को सींचते और उनकी देखभाल किया करते थे ।
जहाँ पहले एक छोटी सी कुटी भी नहीं थी, वहाँ तीन-तीन वाड़ों
का निर्माण हो गया । इन सब में साठे-वाड़ा पूर्वकाल में बहुत ही
उपयोगी था ।
बगीचे की कथा, वामन तात्या की सहायता से स्वयं बगीचे की
देखभाल, शिरडी से श्री साई बाबा की अस्थायी अनुपस्थिति
तथा चाँद पाटील की बारात में पुनः शिरडी में लौटना,
देवीदास, जानकीदास और गंगागीर की संगति, मोहिद्दीन
तम्बोली के साथ कुश्ती, मसजिद सें निवास, श्री डेंगने व अन्य
भक्तों पर प्रेम तथा अन्य घटनाओं का अगतले अध्याय में वर्णन
किया गया है ।
।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।
Saturday, October 3, 2015
श्री साँई सच्चरित्र अध्याय 4
साँई शरण ही हमारा ध्येय
बाबा साँई की शरण ही हम साँई चरण प्रेमियो का मुख्य ध्येय होना चाहिये
क्योकि साँई चरण ही हमारा जीवन है और अंत में साँई में मिल जाना है
अत साँई से हम कितना भी दूर रह ले अंत में उनकी गोद में ही आना होता है
एक उदाहरण से अपनी इस बात को रखने का प्रयास कर रहा हूँ :-
एक बूँद सागर के पास जाती है तो कहती है कि
"मैं तुममे नही मिलना चाहती , तुममे मिलते ही मेरा खुद का वजूद नही रहेगा
मैं अकेले ही रहना चाहती हूँ स्वतन्त्र रूप में ताकि मेरा अस्तित्व बना रहे ।"
सागर ने कहा:- " बच्ची मैं तुम जैसे असंख्य बूंदों से मिलकर बना हूँ
तुम मुझमे मिलोगी तो तुम्हारा अस्तित्व खत्म नही होगा यकीनन तुम्हारा कद बढ़ेगा और अस्तित्व भी "
इसी बीच सूर्य की तपन से बूँद वाष्प बनकर उड़ गयी और बारिश की बूँद बन गयी
और बारिश की बूँद बनने के बाद फिर सागर के पास आना पड़ा
तब सागर ने फिर कहा कि -देखो बच्ची तुम्हे फिर मेरे पास आना पड़ा ना
अब आया समझ में कि तुमको अंतत आना मेरे पास ही है क्योकि तुम्हारा उद्भव मुझ ही से हुआ है और मुझ में ही तुमको मिलना है , तभी तुम्हे सुकून और चैन मिलेगा ।
ठीक इसी तरह साँई की ही गोद में हम सभी असंख्य बूंदे रूपी साँई चरण प्रेमियो को सन्तोष मिलेगा
और हमारा उद्भव साँई जी से है और हमे उन्ही में मिलना है
तो क्यों न जीवन को साँईमय कर दे ?
http://drgauravsai.blogspot.com/
Friday, October 2, 2015
श्री साँई सच्चरित्र अध्याय 3
श्री साई सच्चरित्र अध्याय 3
अध्याय 3 - श्री साईंबाबा की स्वीकृति, आज्ञा और
प्रतीज्ञा, भक्तों को कार्य समर्पण, बाबा की लीलाएँ
ज्योतिस्तंभ स्वरुप, मातृप्रेम–रोहिला की कथा, उनके मधुर
अमृतोपदेश ।
श्री साईंबाबा की स्वीकृति और वचन देना
जैसा कि गत अध्याय में वर्णन किया जा चुका है, बाबा ने
सच्चरित्र लिखने की अनुमति देते हुए कहा कि सच्चरित्र लेखन के
लिये मेरी पूर्ण अनुमति है । तुम अपना मन स्थिर कर, मेरे वचनों में
श्रदृा रखो और निर्भय होकर कर्त्तव्य पालन करते रहो । यदि मेरी
लीलाएँ लिखी गई तो अविघा का नाश होगा तथा ध्यान व
भक्तिपूर्वक श्रवण करने से, दैहिक बुदि नष्ट होकर भक्ति और प्रेम
की तीव्र लहर प्रवाहित होगी और जो इन लीलाओं की अधिक
गहराई तक खोज करेगा, उसे ज्ञानरुपी अमूल्य रत्न की प्राप्ति
हो जायेगी ।
इन वचनों को सुनकर हेमाडपंत को अति हर्ष हुआ और वे निर्भय हो
गये । उन्हें दृढ़ विश्वास हो गया कि अब कार्य अवश्य ही सफल
होगा ।
बाबा ने शामा की ओर दृष्टिपात कर कहा – जो, प्रेमपूर्वक मेरा
नामस्मरण करेगा, मैं उसकी समस्त इच्छायें पूर्ण कर दूँगा । उसकी
भक्ति में उत्तरोत्तर वृदिृ होगी । जो मेरे चरित्र और कृत्यों का
श्रदृापूर्वक गायन करेगा, उसकी मैं हर प्रकार से सदैव सहायता
करुँगा । जो भक्तगण हृदय और प्राणों से मुझे चाहते है, उन्हें मेरी
कथाऐं श्रवण कर स्वभावतः प्रसन्नता होगी । विश्वास रखो कि
जो कोई मेरी लीलाओं का कीर्तन करेगा, उसे परमानन्द और
चिरसन्तोष की उपलबि्ध हो जायेगी । यह मेरा वैशिष्टय है कि
जो कोई अनन्य भाव से मेरी शरण आता है, जो श्रदृापूर्वक मेरा
पूजन, निरन्तर स्मरण और मेरा ही ध्यान किया करता है, उसको मैं
मुक्ति प्रदान कर देता हूँ ।
जो नित्यप्रति मेरा नामस्मरण और पूजन कर मेरी कथाओं और
लीलाओं का प्रेमपूर्वक मनन करते है, ऐसे भक्तों में सांसारिक
वासनाएँ और अज्ञानरुपी प्रवृत्तियाँ कैसे ठहर सकती है । मैं उन्हें
मृत्यु के मुख से बचा लेता हूँ ।
मेरी कथाऐं श्रवण करने से मूक्ति हो जायेगी । अतः मेरी कथाओं
श्रदृापूर्वक सुनो, मनन करो । सुख और सन्तोष-प्राप्ति का सरल
मार्ग ही यही है । इससे श्रोताओं के चित्त को शांति प्राप्त
होगी और जब ध्यान प्रगाढ़ और विश्वास दृढ़ हो जायगा, तब
अखोड चैतन्यघन से अभिन्नता प्राप्त हो जाएगी । केवल साई साई
के उच्चारणमात्र से ही उनके समस्त पाप नष्ट हो जाएगें ।
भिन्न भिन्न कार्यों की भक्तों को प्रेरणा
भगवान अपने किसी भक्त को मन्दिर, मठ, किसी को नदी के तीर
पर घाट बनवाने, किसी को तीर्थपर्यटन करने और किसी को
भगवत् कीर्तन करने एवं भिन्न भिन्न कार्य करने की प्रेरणा देते है ।
परंतु उन्होंने मुझे साई सच्चरित्र-लेखन की प्रेरणा की । किसी भी
विघा का पूर्ण ज्ञान न होने के कारण मैं इस कार्य के लिये सर्वथा
अयोग्य था । गतः मुझे इस दुष्कर कार्य का दुस्साहस क्यों करना
चाहिये । श्री साई महाराज की यथार्थ जीवनी का वर्णन करने
की सामर्थय किसे है । उनकी कृपा मात्र से ही कार्य सम्पूर्ण
होना सम्भव है । इसीलिये जब मैंने लेखन प्रारम्भ किया तो बाबा
ने मेरा अहं नष्ट कर दिया और उन्हेंने स्वयं अपना चरित्र रचा । अतः
इस चरित्र का श्रेय उन्हीं को है, मुझे नही ।
जन्मतः ब्राहमण होते हुए भी मैं दिव्य चक्षु-विहीन था, अतः साई
सच्चरित्र लिखने में सर्वथा अयोग्य था । परन्तु श्री हरिकृपा से
क्या सम्भव वहीं है । मूक भी वाचाल हो जाता है और पंगु भी
गिरिवर चढ़ जाता है । अपनी इच्छानुसार कार्य पूर्ण करने की
युक्ति वे ही जानें । हारमोनियम और बंसी को यह आभास कहाँ
कि ध्वनि कैसे प्रसारित हो रही है । इसका ज्ञान तो वादक को
ही है । चन्द्रकांतमणि की उत्पत्ति और ज्वार भाटे का रहम्य
मणि अथवा उदधि नहीं, वरन् शशिकलाओं के घटने-बढने में ही
निहित है ।
बाबा का चरित्रः ज्योतिस्तंभ स्वरुप
समुद्र में अनेक स्थानों पर ज्योतिस्तंभ इसलिये बनाये जाते है,
जिससे नाविक चटटानों और दुर्घटनाओं से बच जायें और जहाज का
कोई हानि न पहुँचे । इस भवसागर में श्री साई बाबा का चरित्र
ठीक उपयुक्त भाँति ही उपयोगी है । वह अमृत से भी अति मधुर और
सांसारिक पथ को सुगम बनाने वाला है । जब वह कानों के दृारा
हृदय में प्रवेश करता है, तब दैहिक बुदि नष्ट हो जाती है और हृदय में
एकत्रित करने से, समस्त कुशंकाएँ अदृश्य हो जाती है । अहंकार का
विनाश हो जाता है तथा बौदिृक आवरण लुप्त होकर ज्ञान प्रगट
हो जाता है । बाब की विशुदृ कीर्ति का वर्णन निष्ठापूर्वक
श्रवण करने से भक्तों के पाप नष्ट होंगे । अतः यह मोक्ष प्राप्ति
का भी सरल साधन है । सत्यतुग में शम तथा दम, त्रेता में त्याग,
दृापर में पूजन और कलियुग में भगवत्कीर्तन ही मोक्ष का साधन है ।
यह अन्तिम साधन, चारों वर्णों के लोगों को साध्य भी है । अन्य
साधन, योग, त्याग, ध्यान-धारणा आदि आचरण करने में कठिन है,
परंतु चरित्र तथा हरिकीर्तन का श्रवण और कीर्तन से इन्द्रियों
की स्वाभाविक विषयासक्ति नष्ट हो जाती है और भक्त
वासना-रहित होकर आत्म साक्षात्कार की ओर अग्रसर हो
जाता है । इसी फल को प्रदान करने के हेतु उन्होंने सच्चरित्र का
निर्माण कराया । भक्तगण अब सरलतापूर्वक चरित्र का अवलोकन
करें और साथ ही उनके मनोहर स्वरुप का ध्यान कर, गुरु और भगवत्-
भक्ति के अधिकारी बनें तथा निष्काम होकर आत्मसाक्षात्कार
को प्राप्त हों । साईं सच्चरित्र का सफलतापूर्वक सम्पूर्ण होना,
यह साई-महिमा ही समझें, हमें तो केवल एक निमित्त मात्र ही
बनाया गया है ।
मातृप्रेम
गाय का अपने बछडे़ पर प्रेम सर्वविदित ही है । उसके स्तन सदैव दुग्ध
से पूर्म रहते हैं और जब भुखा बछड़ा स्तन की ओर दौड़कर आता है
तो दुग्ध की धारा स्वतः प्रवाहित होने लगती है । उसी प्रकार
माता भी अपने बच्चे की आवश्यकता का पहले से ही ध्यान रखती
है और ठीक समय पर स्तनपान कराती है । वह बालक का श्रृंगार
उत्तम ढ़ंग से करती है, परंतु बालक को इसका कोई भान ही नहीं
होता । बालक के सुन्दर श्रृंगाराररि को देखकर माता के हर्ष का
पारावार नहीं रहता । माता का प्रेम विचित्र, असाधारण और
निःस्वार्थ है, जिसकी कोई उपमा नही है । ठीक इसी प्रकार
सद्गगुरु का प्रेम अपने शिष्य पर होता है । ऐसा ही प्रेम बाबा का
मुझ पर था और उदाहरणार्थ वह निम्न प्रकार था ः-
सन् 1916 में मैने नौकरी से अवकाश ग्रहण कीया । जो पेन्शन मुझे
मिलती थी, वह मेरे कुटुम्ब के निर्वाह के लिये अपर्याप्त थी । उसी
वर्ष ती गुरुपूर्णिमा के विवस मैं अनाय भक्तों के साथ शिरडी गया
। वहाँ अण्णा चिंचणीकर ने स्वतः ही मेरे लिये बाबा से इस प्रकार
प्रार्थना की, इनके ऊपर कृपा करो । जो पेन्शन इन्हें मिलती है, वह
निर्वाह-योग्य नही हैं । कुटुम्ब में वृदि हो रही है । कृपया और कोई
नौकरी दिला दीजिये, ताकि इनकी चिन्ता दूर हो और ये
सुखपूर्वक रहें । बाबा ने उत्तर दिया कि इन्हें नौकरी मिल जायेगी,
परंतु अब इन्हें मेरी सेवा में ही आनन्द लेना चाहिए । इनकी इच्छाएँ
सदैव पूर्ण होंगी, इन्हें अपना ध्यान मेरी ओर आकर्षित कर,
अधार्मिक तथा दुष्ट जनों की संगति से दूर रहना चाहिये । इन्हें
सबसे दया और नम्रता का बर्ताव और अंतःकरण से मेरी उपासना
करनी चाहिये । यदि ये इस प्रकार आचरण कर सके तो नित्यान्नद
के अधिकारी हो जायेंगे ।
रोहिला की कथा
यह कथा श्री साई बाबा के समस्त प्राणियों पर समान प्रेम की
सूचक है । एक समय रोहिला जाति का एक मनुष्य शिरडी आया ।
वह ऊँचा-पूरा, सुदृढ़ एवं सुगठित शरीर का था । बाबा के प्रेम से
मुग्ध होकर वह शिरडी में ही रहने लगा । वह आठों प्रहर अपनी उच्च
और कर्कश ध्वनि में कुरान शरीफ के कलमे पढ़ता और अल्लाहो
अकबर के नारे लगाता था । शिरडी के अधिकांश लोग खेतों में
दिन भर काम करने के पश्चात जब रात्रि में घर लौटते तो रोहिला
की कर्कश पुकारें उनका स्वागत करती है । इस कारण उन्हें रात्रि में
विश्राम न मिलता था, जिससे वे अधिक कष्ट असहनीय हो गया,
तब उन्होंने बाबा के समीप जाकर रोहिला को मना कर इस
उत्पात को रोकने की प्रार्थना की । बाबा ने उन लोगों की इस
प्रार्थना पर ध्यान न दिया । इसके विपरीत गाँववालों को आड़े
हाथों लेते हुये बोले कि वे अपने कार्य पर ही ध्यान दें और रोहिला
की ओर ध्यान न दें । बाबा ने उनसे कहा कि रोहिला की पत्नी
बुरे स्वभाव की है और वह रोहिला को तथा मुझे अधिक कष्ट
पहुंचाती है, परंतु वह उसके कलमों के समक्ष उपस्थित होने का साहस
करने में असमर्थ है और इसी कारण वह शांति और सुख में है । यथार्थ में
रोहिला की कोई पत्नी न थी । बाबा के संकेत केवल कुविचारों
की ओर था । अन्य विषयों की अपेक्षा बाबा प्रार्थना और ईश-
आराधना को महत्तव देते थे । अतः उन्होंने रोहिला के पक्ष का
समर्थन कर, ग्रामवासियों को शांतिपूर्वक थोड़े समय तक उत्पात
सहन करने का परामर्श दिया ।
बाबा के मधुर अमृतोपदेश
एक दिन दोपहर की आरती के पश्चात भक्तगण अपने घरों को लौट
रहे थे, तब बाबा ने निम्नलिखित अति सुन्दर उपदेश दिया –
तुम चाहे कही भी रहो, जो इच्छा हो, सो करो, परंतु यह सदैव
स्मरण रखो कि जो कुछ तुम करते हो, वह सब मुझे ज्ञात है । मैं ही
समस्त प्राणियों का प्रभु और घट-घट में व्याप्त हूँ । मेरे ही उदर में
समस्त जड़ व चेतन प्राणी समाये हुए है । मैं ही समस्त ब्राहांड़ का
नियंत्रणकर्ता व संचालक हूँ । मैं ही उत्पत्ति, व संहारकर्ता हूँ ।
मेरी भक्ति करने वालों को कोई हानि नहीं पहुँचा सकता । मेरे
ध्यान की उपेक्षा करने वाला, माया के पाश में फँस जाता है ।
समस्त जन्तु, चींटियाँ तथा दृश्यमान, परिवर्तनमान और स्थायी
विश्व मेरे ही स्वरुप है ।
इस सुन्दर तथा अमूल्य उपदेश को श्रवण कर मैंने तुरन्त यह दृढ़ निश्चय
कर लिया कि अब भविष्य में अपने गुरु के अतिरिक्त अन्य किसी
मानव की सेवा न करुँगा । तुझे नौकरी मिल जायेगी – बाबा के इन
वचनों का विचार मेरे मस्तिष्क में बारंबार चक्कर काटने लगा । मुझे
विचार आने लगा, क्या सचमुच ऐसा घटित होगा । भविष्य की
घटनाओं से स्पष्ट है कि बाबा के वचन सत्य निकले और मुझे
अल्पकाल के लिये नौकरी मिल गई । इसके पश्चात् मैं स्वतंत्र होकर
एकचित्त से जीवनपर्यन्त बाबा की ही सेवा करता रहा ।
इस अध्याय को समाप्त करने से पूर्व मेरी पाठकों से विनम्र
प्राथर्ना है कि वे समस्त बाधाएँ – जैसे आलस्य, निद्रा, मन की
चंचलता व इन्द्रिय-आसक्ति दूर कर और एकचित्त हो अपना ध्यान
बाबा की लीलाओं की ओर वें और स्वाभाविक प्रेम निर्माण कर
भक्ति-रहस्य को जाने तथा अन्य साधनाओं में व्यर्थ श्रमित न हो
। उन्हें केवन एक ही सुगम उपाय का पालन करना चाहिये और वह है
श्री साईलीलाओं का श्रवण । इससे उनका अज्ञान नष्ट होकर
मोक्ष का दृार खुल जायेगा । जिसप्रकार अनेक स्थानों में भ्रमण
करता हुआ भी लोभी पुरुष अपने गड़े हुये धन के लिये सतत चिन्तित
रहता है, उसी प्रकार श्री साई को अपने हृदय में धारण करो । अगले
अध्याय में श्री साई बाबा के शिरडी आगमन का वर्णन होगा ।
।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।
श्री साई सच्चरित्र अध्याय 2 श्री साई सच्चरित्र अध्याय 2 - ग्रन्थ लेखन का ध्येय, कार्यारम्भ में असमर्थता और साहस, गरमागरम बहस, अर्थपूर्ण उपाधि हेमाडपन्त, गुरु की आवश्यकता । गत अध्याय में ग्रन्थकार ने अपने मौलिक ग्रन्थ श्री साई सच्चरित्र (मराठी भाषा) में उन कारणों पर प्रकाश डाला था, जिननके दृारा उन्हें ग्रन्थरतना के कार्य को आरन्भ करने की प्रेरणा मिली । अब वे ग्रन्थ पठन के योग्य अधिकारियों तथा अन्य विषयों का इस अध्याय में विवेचन करते हैं । ग्रन्थ लेखन का हेतु किस प्रकार विषूचिका (हैजा) के रोग के प्रकोप को आटा पिसवाकर तथा उसको ग्राम के बाहर फेमककर रोका तथा उसका उन्मूलन किया, बाबा की इस लीला का प्रथम अध्याय में वर्णन किया जा चुका है । मैंने और भी लीलाएँ सुनी, जिनसे मेरे हृदत को अति आनंद हुआ और यही आनंद का स्त्रोत काव्य (कविता) रुप में प्रकट हुआ । मैंने यह भी सोचा कि इन महान् आश्चर्ययुक्त लीलाओं का वर्णन बाबा के भक्तों के लिये मनोरंजक इवं शिक्षाप्रद सिदृ होगा तथा उनके पाप समूल नष्ट हो जायेंगे । इसलिये मैंने बाबा की पवित्र गाथा और मधुर उपदेशों का लेखन प्रारम्भ कर दिया । श्री साईं की जीवनी न तो उलझनपूर्ण और न संकीर्ण ही है, वरन् सत्य और आध्यात्मिक मार्ग का वास्तविक दिग्दर्शन कराती है । कार्य आरम्भ करने में असमर्थता और साहस श्री हेमाडपन्त को यह विचार आया कि मैं इस कार्य के लिये उपयुक्त पात्र नहीं हूँ । मैं तो अपने परम मित्र की जीनी से भी भली भाँति परिचित नहीं हूँ और न ही अपनी प्रकृति से । तब फिर मुझ सरीखा मूढ़मति भला एक महान् संतपुरुष की जीवनी लिखने का दुस्साहस कैसे कर सकता है । अवतारों की प्रकृति के वर्णन में वेद भी अपनी असमर्थता प्रगट करते हैं । किसी सन्त का चरित्र समझने के लिये स्वयं को पहले सन्त होना नितांत आवश्यक है । फिर मैं तो उनका गुणगान करने के सर्वथा अयोगमय ही हूँ । संत की जीवनी लिखना एक महान् कठिन कार्य है, जिसकी तुलना में सातों समुद्र की गहराई नापना और आकाश को वस्त्र से ढकना भी सहज है । यह मुझे भली भरणति ज्ञात था कि इस कार्य का आरम्भ करनेके लिये महान् साहस की आवश्यकता है और कहीं ऐसा न हो कि चार लोगों के समक्ष हास्य का पात्र बनना पड़े, इसीलिये श्री साईं बाबा की कृपा प्राप्त करने के लिये मैं ईश्वर से प्रार्थना करने लगा । महाराष्ट्र के संतश्रेष्ठ श्री ज्ञानेश्वर महाराज के कथन है कि संतचरित्र के रचयिता से परमात्मा अति प्रसन्न होता है । तुलसीदास जी ने भी कहा है कि-साधुचरित शुभ सरिस कपासू । निरस विषद गुणमय फल जासू ।। जो सहि दुःख पर छिद्र दुरावा । वंदनीय जेहि जग जस पावा ।। भक्तों को भी संतों की सेवा करने की इच्छा बनी रहती है । संतों की कार्य पूर्ण करा लेने की प्रणाली भी विचित्र ही है । यथार्थ प्रेरणा तो संत ही किया करते हैं, भक्त तो निमित्त मात्र, या कहिये कि कार्य पूर्ति के लिये एक यंत्र मात्र है । उदाहरणार्थ शक सं. 1700 में कवि महीपति को संत थरित्र लेखन की प्रेरणा हुई । संतों ने अंतःप्रेरणा की और कार्य पूर्ण हो गया । इसी प्रकार शक सं. 1800 में श्री दासगणू की सेवा स्वीकार हुई । महीपति ने चार काव्य रचे – भक्तविजय, संतविजय, भक्तलीलामृत और संतलीलामृत और दासगणू ने केवल दो – भक्तलीलामृत और संतकथामृत – जिसमें आधुनिक संतों के चरित्रों कावर्णन है । भक्तलीलामृत के अध्याय 31, 32, और 33 तथा संत कथामृत के 57 वें अध्याय में श्री साई बाबा की मधुर जीवनी तथा अमूल्य उपदेशों का वर्णन सुन्दर एवं रोचक ढ़ंग से किया गया है । पाठकों से इनके पठन का अनुरोध है । इसी प्रकार श्री साई बाबा की अद्भभुत लीलाओं का वर्णन एक बहुत सुन्दर छोटी सी पुस्तिका - श्री साई बाबा भजनमाला में किया गया है । इसकी रचना बान्द्रा की श्रीमती सावित्रीबाई रघुनाथ तेंडुलकर ने की है । श्री दासगणू महाराज ने भी श्री साई बाबा पर कई मधुर कविताओं की रचना की है । एक और भक्त अमीदास भवानी मेहता ने भी बाबा की कुथ कथाओ को गुजराती में प्रकाशित किया है । साई प्रभा नामक पत्रिका में भी कुछ लीलाएँ शिरडी के दक्षिणा भिक्षा संस्थान दृारा प्रकाशित की गई है । अब प्रश्न यह उठता हैं कि जब श्री साईनाथ महाराज के जीवन पर प्रकाश डालने वाला इतना साहित्य उपलब्ध है, फिर ौर एक ग्रन्थ साई सच्चरित्र रचने की आवश्यकता ही कहाँ पैदा होती है । इसका उत्तर केवल यही है कि श्री साई बाबा की जीवनी सागर के सदृश अगाध, विस्तृत और अथाह है । यति ुसमें गहरे गोता लगाया जाय तो ज्ञान एवं भक्ति रुपी अमूल्य रत्नों की सहज ही प्राप्ति हो सकती है, जिनसे मुमुक्षुओं को बहुत लाभ होगा । श्री साई बाबा की जीवनी, उनके दृष्टान्त एवं उपदेश महान् आश्चर्य से परिपूर्ण है । दुःख और दुर्भाग्यग्रस्त मानवों को इनसे शान्ति और सुख प्राप्त होगा तथा लोक व परलोक मे निःश्रेयस् की प्राप्ति होगी । यदि श्री साई बाबा के उपदेशो का, जो वैदिक शिक्षा के समान ही मनोरंजक और शिक्षाप्रद है, ध्यानपूर्वक श्रवण एवं मनन किया जाये तो भक्तों को अपने मनोवांछित फल की प्राप्ति हो जायेगी , अर्थात् ब्रहम से अभिन्नता, अष्टांग योग की सिदिृ और समाधि आनन्द आदि की प्राप्ति सरलता से हो जायगी । यह सोचकर ही मैंने चरित्र की कथाओं को संकलित करना प्रारम्भ कर दिया । साथ ही यह विचार भी आया कि मेरे लिये सबसे उत्तम साधना भी केवल यही है । जो भोले-भाले प्राणी श्री साई बाबा के दर्शनों सो अपने नेत्र सफल करने के सौभाग्य से वंचित रहे है, उन्हें यह चरित्र अति आनन्ददायक प्रतीत होगा । अतः मैंने श्री साई बाबा के उपदेश और दृषटान्तों की खोज प्रारम्भ कर दी, जो कि उनकी असीम सहज प्राप्त आत्मानिभूतियों का निचोड़ था । मुझे बाबा ने प्रेरणा दी और मैंने भी अपना अहंकार उनके श्री चरणों पर न्योछावर कर दिया । मैने सोचा कि अब मेरा पथ अति सुगम हो गया है और बाबा मुझे इहलोक और परलोक में सुखी बना देंगे । मैं स्वंय बाब की आज्ञा प्राप्त करने का साहस नहीं कर सकता था । अतः मैंने श्री माधवराव उपनाम शामा से, जो कि बाब के अंतरंग भक्तों में से थे, इस हेतु प्रार्थना की । उन्होंने इस कार्य के निमित्त श्री साई बाबा से विनम्र शब्दों में इस प्रकार प्रार्थना की कि ये अण्णासाहेब आपकी जीवनी लिखने के लिये अति उत्सुक है । परन्तु आप कृपया ऐसा न कहना कि मैं तो एक फकीर हूँ तथा मेरी जीवनी लिखने की आवश्यकता ही क्या है । आपकी केवल कृपा और अनुमति से ही ये लिख सकेंगें, अथवा आपके श्री चरणों का पुण्यप्रताप ही इस कार्य को सफल बना देगा । आपकी अनुमति तथा आशीर्वाद के अभाव में कोई भी करर्य यशस्वी नहीं हो सकता । यह प्रार्थना सुनकर बाबा को दया आ गई । उन्होंने आश्वासन और उदी देकर अपना वरद-हस्त मेरे मस्तक पर रखा और कहने लगे कि इन्हें जीवनी और दृष्टान्तों को एकत्रित कर लिपिबदृ करने दो, मैं इनकी सहायता करुगाँ । मैं स्वयं ही अपनी जीवनी लिखकर भक्तों की इच्छा पूर्ण करुगाँ । परंतु इनको अपना अहं त्यागकर मेरी शरण में आना चाहिये । जो अपने जीलन में इस प्रकार आचरण करता है, उसकी मैं अत्यधिक सहायता करता हूँ । मेरी जीवन-कथाओं की बात तो हज है, मैं तो इन्हें घर बैठे अनेक प्रकार से सहायता पहुँचाता हूँ । जब इनका अहं पूर्णताः नष्ट हो जायेगा और खोजनेपर लेशमात्र भी न मिलेगा, तब मैं इनके अन्तःकरण में प्रगट होकर स्वयं ही अपनी जीवनी लिखूँगा । मेरे चरित्र और उपदेशों के श्रवण मात्र से ही भक्तों के हृदय में श्रदृा जागृत होकर सरलतापूर्वक आत्मानुभूति एवं परमानंद की प्राप्ति हो जायेगी । ग्रन्थ में अपने मत का प्रतिपादन और दूसरो का खमडन तथा अन्य किसी विषय के पक्ष या विपक्ष में व्यर्थ के वादविवाद की कुचेष्टा नहीं होनी चाहिये । अर्थपूर्ण उपाधि हेमाडपंत वादविवाद शब्द से हमको स्मरण हो आया कि मैंने पाठको को वचन दिया है कि हेमाडपंत उपाधि किस प्रकार प्राप्त हुई, इसका वर्णन करुँगा । अब मैं उसका वर्णन करता हूँ । श्री काकासाहेब दीक्षित व नानासाहेब चांदोरकर मेरे अति घनिष्ठ मित्रों में से थे । उन्होंने मुझसे शिरडी जाकर श्री साई बाबा के दर्शनें का लाभ उठाने का अनुरोध किया । मैंनें उन्हे वचन दिया, परन्तु कुछ बाधा आ जाने के कारण मेरी ळिरडी-यात्रा स्थगित हो गई । मेरे एक घनिष्ठ मित्र का पुत्र लोनावला में रोगग्रस्त हो गया था । उन्होंने सभी सम्भव आधिभौतिक और आध्यात्मिक उपचार किये, परन्तु सभी प्रत्यन निष्फल हुए और ज्वर किसी प्रकार भी कम न हुआ । अन्त में उन्होंने अपने गुरुदेव को उसके सिरहाने ज्वर बिठलाया, परंतु परिणैस पूर्ववत् ही हुआ । यह घटना देखकर मुझे विचार आया कि जब गुरु एक बालक के प्राणों की भी रक्षा करने में असमर्थ है, तब उनकी उपयोगिता ही क्या है । और जब उनमें कोई सामर्थय ही नही, तब फिर शिरडी जाने से क्या प्रयोजन । ऐसा सोचकर मैंने अपनी यात्रा स्थगित कर दी । परंतु जो होनहार है, वह तो होकर ही पहेगा और वह इस प्रकार हुआ । प्रामताधिकारी नानासाहेब चांदोरकर बसई को दौरेपर जा रहे थे । वे ठाणा से दादर पहुँचे तथा बसई जाने वाली गाड़ी की प्रतीक्षा कर रहे थे । उसी समय बांद्रा लोकल आ पहुँची, जिसमें बैठकर वे बांद्रा पहुँचे तथा शिरडीयात्रा स्थगित करने के लिये मुझे आड़े हाथों लिया । नानासाहेब का तर्क मुझे उचित तथा सुखदायी प्रतीत हुआ और इसके फलस्वरुप मैंने उसी रात्रि शिरडी जाने का निश्चय किया और सामान बाँधकर शिरडी को प्रस्थान कर दिया । मैंनें सीधे दादर जाकर वहाँ से मनमाड की गाड़ी पकड़ने का कार्यक्रम बनाया । इस निश्चय के अनुसार मैंने दादर जाने वाली गाड़ी के डिब्बे में प्रवेश किया । गाड़ी छूटने ही वाली थी कि इतने में एक यवन मेरे डिब्बे में आया और मेरा सामान देखकर मुझसे मेरा गन्तव्य स्थान पूछने लगा । मैंनें अपना कार्यक्रम उसे बतला दिया । उसने मुझसे कहा कि मनमाड की गाड़ी दादर पर खड़ी नहीं होता, इसलिये सीधे बोरीबन्दर से होकर जाओ । यदि यह एक साधारण सी घटना घटित न हुई होती तो मैं अपने कार्यक्रम के अनुसार दूसरे दिन शिरडी न पहुँच सकने के कारण अनेक प्रकार की शंका-कुशंकाओ से घिर जाता । परंतु ऐसा घटना न था । भाग्य ने साथ दिया और दूसरे दिन 9-10 बजे के पूर्वही मैं शिरडी पहुँच गया । यह सन् 1910 की बात है, जब प्रवासी भक्तों के ठहरने के लिये साठेवाड़ा ही एकमात्र स्थान था । ताँगे से उतरने पर मैं साईबाबा के दर्शनों के लिये बड़ा लालायित था । उसी समय भक्तप्रवर श्री तात्यासाहेब नूलकर मसजिद से लौटे ही थे । उन्होंने बतलाया कि इस समय श्री साईबाबा मसजिद की मोंडपर ही हैं । अभी केवल उनका प्रारम्भिक दर्शन ही कर लो और फिर स्नानादि से निवृत होने के पश्चात, सुविधा से भेंट करने जाना । यह सुनते ही मैं दौड़कर गया और बाबा की चरणवन्दना की । मेरी प्रसन्नता का पारावार न रहा । मुझे क्या नहीं मिल गया था । मेरा शरीर उल्लसित सा हो गया । क्षुधा और तृषा की सुधि जाती रही । जिस क्षण से उनके भवविनरशक चरणों का स्पर्श प्रार्त हुआ, मेरे जीवन के दर्शनार्थ पर्ेरणग, प्रोत्साहन और सहायता पहुँचाई, उनके प्रति मेरा हृदय बारम्बार कृतज्ञता अनुभव करने लगा । मैं उनका सदैव के लिये ऋणी हो गया । उनका यह उपकार मैं कभी भूल न सकूँगा । यथार्थ में वे ही मेरे कुटुम्बी हैं और उनके ऋण से मैं कभी भी मुक्त न हो सकूँगा । मैं सदा उनका स्मरण कर उन्हें मानसिक प्रणाम किया करता हूँ । जैसा कि मेरे अनुभव में आया कि साई के दर्शन में ही यह विशेषता है कि वितार परिवर्तन तथा पिछले कर्मों का प्रभाव शीघ्र मंद पड़ने लगता है और शनैः शनैः अनासक्ति और सांसारिक भोगों से वैराग्य बढ़ता जाता है । केवल गत जन्मों के अनेक शुभ संस्कार एकत्रित होनेपर ही ऐसा दर्शन प्राप्त होना सुलभ हो सकता है । पाठको, मैं आपसे शपथपूर्वक कहता हूँ कि यदि आप श्री साईबाबा को एक दृष्टि भरकर देख लेंगे तो आपको सम्पूर्ण विश्व ही साईमय दिखलाई पड़ेगा । गरमागरम बहस शिरडी पहुंतने के प्रथम दिन ही बालासाहेब तथा मेरे बीच गुरु की आवश्यकता पर वादविवाद छिड़ गया । मेरा मत था कि स्वतंत्रता त्यागकर पराधीन क्यों होना चाहिये तथा जब कर्म करना ही पड़ता है, तब गुरु की आवश्यकता ही कहां रही । प्रत्येक को पूर्ण प्रयत्न कर स्वयं को आगे बढ़ाना चाहिये । गुरु शिष्य के लिये करता ही क्या है । वह तो सुख से निद्रा का आनंद लेता है । इस प्रकार मैंने स्वतंत्रता का पक्ष लिया और बालासाहेब ने प्रारब्ध का । उन्होंने कहा कि जो विधि- लिखित है, वह घटित होकर रहेगा, इसमें उच्च कोटि के महापुरुष भी असफल हो गये हैं । कहावत है – मेरे मन कछु और है, धाता के कछु और । फिर परामर्शयुक्त शब्दों मे बोले भाई साहब, यह निरी विदृता छोड़ दो । यह अहंकार तुम्हारी कुछ भी सहायता न कर सकेगा । इस प्रकार दोनों पक्षों के खंडन-मंडन में लगभग एक घंटा व्यतीत हो गया और सदैव की भाँति कोई निष्कर्ष न निकल सका । इसीलिये तंग और विवष होकर विवाद स्थगित करनग पड़ा । इसका परिणाम यह हुआ कि मेरी मानसिक शांति भंग हो गई तथा मुझे अनुभव हुआ कि जब तक घोर दैहिक बुदृि और अहंकार न हो, तब तक विवाद संभव नहींं । वस्तुतः यह अहंकार ही विवाद की जड़ है । जब अन्य लोगों के साथ मैं मसजिद गया, तब बाबा ने काकासाहेब को संबोधित कर प्रश्न किया कि साठेबाड़ा में क्या चल रहा हैं । किस विषय में विवाद था । फिर मेरी ओर दृष्टिपात कर बोले कि इन हेमाडपंत ले क्या कहा । ये शब्द सुनकर मुझे अधिक अचम्भा हुआ । साठेबाड़ा और मसजिद में पर्याप्त अन्तर था । सर्वज्ञ या अंतर्यामि हुए बिना बाबा को विवाद का ज्ञान कैसे हो सकता था । मैं सोचने लगा कि बाबा हेमाडपंत के नाम से मुझे क्यों सम्बोधित करते हैं । यह शब्द तो हेमाद्रिपंत का अपभ्रंश है । हेमाद्रिपंत देवगिरि के यादव राजवंशी महाराजा महादेव और रामदेव के विख्यात मंत्री थे । वे उच्च कोटि के विदृान्, उत्तम प्रकृति और चतुवर्ग चिंतामणि (जिसमें आध्यात्मिक विषयों का विवेचन है ।) और राजप्रशस्ति जैसे उत्तम काव्यों के रचयिता थे । उन्होंने ही हिसाब-किताब रखने की नवीन प्रणाली को जन्म दिया था और कहाँ मैं इसके विपरीत एक अज्ञानी, मूर्ख और मंदमति हूँ । अतः मेरी समझ में यह न आ सका कि मुझे इस विशेष उपाधि से विभूषित करने का क्या तात्पर्य हैं । गहन विचार करने पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि कही मेरे अहंकार को चूर्ण करने के लिये ही तो बाबा ने इस अस्त्र का प्रयोग नहीं किया है, ताकि मैं भविष्य में सदैव के लिए निरभिमानी एवं विनम्र हो जाऊँ, अथवा कहीं यह मेरे वाक्रचातुर्य के उपलक्ष में मेरी प्रशंसा तो नहीं है । भविष्य पर दृष्टिपात करने से प्रतीत होता है कि बाबा के दृारा हेमाडपंत की उपाधि से विभूषित करना कितना अर्थपूर्ण और भविष्यगोचर था । सर्वविदित है कि कालान्तर में दाभोलकर ने श्री साईंबाबा संस्थान का प्रबन्ध कितने सुचारु एवं विदृतापूर्ण ढ़ग से किया था । हिसाब-किताब आदि कितने उत्तम प्रकार से रखे तथा साथ ही साथ महाकाव्य साई सच्चरित्र की रचना भी की । इस ग्रन्थ में महत्त्वपूर्ण और आध्यात्मिक विषयों जैसे ज्ञान, भक्ति वैराग्य, शरणागति व आत्मनिवेदन आदि का समावेश है । गुरु की आवश्यकता इस विषय में बाबा ने क्या उद्गगार प्रकट किये, इस पर हेमाडपंत दृारा लिखित कोई लेख या स्मृतिपत्र प्राप्त नहीं है । परंतु काकासाहेब दीक्षित ने इस विषय पर उनके लेख प्रकाशित किये हैं । बाबा से भेंट करने के दूसरे दिन हेमाडपंत और काकासाहेब ने मसजिद में जाकर गृह लौटने की अनुमति माँगी । बाबा ने स्वीकृति दे दी । किसी ने प्रश्न किया – बाबा, कहाँ जायें । उत्तर मिला – ऊपर जाओ । प्रश्न – मार्ग कैसा है । बाबा – अनेक पंथ है । यहाँ से भी एक मार्ग है । परंतु यह मार्ग दुर्गम है तथा सिंह और भेड़िये भी मिलते है । काकासाहेब – यदि पथ प्रदर्शक भी साथ हो तो । बाबा – तब कोई कष्ट न होगा । मार्ग-प्रदर्शक तुम्हारी सिंह और भेड़िये और खन्दकों से रक्षा कर तुम्हें सीधे निर्दिष्ट स्थान पर पहुँचा देगा । परंतु उसके अभाव में जंगल में मार्ग भूलने या गड्रढे में गिर जाने की सम्भावना है । दाभोलकर भी उपर्युक्त प्रसंग के अवसर पर वहाँ उपस्थित थे । उन्होंने सोचा कि जो कुछ बाबा कह रहे है, वह गुरु की आवश्यकता क्यों है । इस प्रश्न का उत्तर है (साईलीला भाग 1, संख्या 5 व पृष्ठ 47 के अनुसार) । उन्होंने सदा के लिये मन में यह गाँठ बाँध ली कि अब कभी इस विषय पर वादविवाद नहीं करेंगे कि स्वतंत्र या परतंत्र व्यकति आध्यात्मिक विषयों के लिये कैसा सिदृ होगा । प्रत्युत इसके विपरीत यथार्थ में परमार्थ-लाभ केवल गुरु के उरदेश में किया गया है, जिसमें लिखा है कि राम और कृष्ण महान् अवतारी होते हुए भी आत्मानुभूति के लिये राम को अपने गुरु वसिष्ठ और कृष्ण को अपने गुरु सांदीपनि की शरण में जाना पड़ा था । इस मार्ग में उन्नति प्राप्त करने के लिये केवल श्रदृा और धैर्य-ये ही दो गुण सहायक हैं । ।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।
Thursday, October 1, 2015
श्री साँई सच्चरित्र अध्याय 1
आज से नित्य ही साँई सच्चरित्र का एक अध्याय यहाँ भेजने का विचार किया है
उसके अंतर्गत आज अध्याय 1:
श्री साई सच्चरित्र अध्याय 1
अध्याय 1 - गेहूँ पीसने वाला एक अद्भभुत सन्त वन्दना-गेहूँ
पीसने की कथा तथा उसका तात्पर्य ।
पुरातन पद्घति के अनुसार श्री हेमाडपंत श्री साई सच्चरित्र
का आरम्भ वन्दना करते हैं ।
प्रथम श्री गणेश को साष्टांग नमन करते हैं, जो कार्य को निर्विध
समाप्त कर उस को यशस्वी बनाते हैं कि साई ही गणपति हैं ।
फिर भगवती सरस्वती को, जिन्होंने काव्य रचने की प्रेरणा दी
और कहते हैं कि साई भगवती से भिन्न नहीं हैं, जो कि स्वयं ही
अपना जीवन संगीत बयान कर रहे हैं ।
फिर ब्रहा, विष्णु, और महेश को, जो क्रमशः उत्पत्ति, सि्थति
और संहारकर्ता हैं और कहते हैं कि श्री साई और वे अभिन्न हैं । वे
स्वयं ही गुरू बनकर भवसहगर से पार उतार देंगें ।
फिर अपने कुलदेवता श्री नारायण आदिनाथ की वन्दना करते हैं ।
जो कि कोकण में प्रगट हुए । कोकण वह भूमि है, जिसे श्री
परशुरामजी ने समुद् से निकालकर स्थापित किया था । तत्पश्चात्
वे अपने कुल के आदिपुरूषों को नमन करते हैं ।
फिर श्री भारदृाज मुनि को, जिनके गोत्र में उनका जन्म हुआ ।
पश्चात् उन ऋषियों को जैसे-याज्ञवल्क्य, भृगु, पाराशर, नारद,
वेदव्यास, सनक-सनंदन, सनत्कुमार, शुक, शौनक, विश्वामित्र,
वसिष्ठ, वाल्मीकि, वामदेव, जैमिनी, वैशंपायन, नव योगींद्,
इत्यादि तथा आधुनिक सन्त जैसे-निवृति, ज्ञानदेव, सोपान,
मुक्ताबाई, जनार्दन, एकनाथ, नामदेव, तुकाराम, कान्हा, नरहरि
आदि को नमन करते हैं ।
फिर अपने पितामह सदाशिव, पिता रघुनाथ और माता को, जो
उनके बचपन में ही गत हो गई थीं । फिर अपनी चाची को, जिन्होंने
उनका भरण-पोषण किया और अपने प्रिय ज्येष्ठ भ्राता को नमन
करते हैं ।
फिर पाठकों को नमन करते हैं, जिनसे उनकी प्रार्थना हैं कि वे
एकाग्रचित होकर कथामृत का पान करें ।
अन्त में श्री सच्चिददानंद सद्रगुरू श्री साईनाथ महाराज को, जो
कि श्री दत्तात्रेय के अवतार और उनके आश्रयदाता हैं और जो
ब्रहा सत्यं जगनि्मथ्या का बोध कराकर समस्त प्राणियों में एक
ही ब्रहा की व्यापि्त की अनुभूति कराते हैं ।
श्री पाराशर, व्यास, और शांडिल्य आदि के समान भक्ति के
प्रकारों का संक्षेप में वर्णन कर अब ग्रंथकार महोदय निम्नलिखित
कथा प्रारम्भ करते हैं ।
गेहूँ पीसने की कथा
सन् 1910 में मैं एक दिन प्रातःकाल श्री साई बाबा के दर्शनार्थ
मसजिद में गया । वहाँ का विचित्र दृश्य देख मेरे आश्चर्य का
ठिकाना न रहा कि साई बाबा मुँह हाथ धोने के पश्चात चक्की
पीसने की तैयारी करने लगे । उन्होंने फर्श पर एक टाट का टुकड़ा
बिछा, उस पर हाथ से पीसने वाली चक्की में गेहूँ डालकर उन्हें
पीसना आरम्भ कर दिया ।
मैं सोचने लगा कि बाबा को चक्की पीसने से क्या लाभ है । उनके
पास तो कोई है भी नही और अपना निर्वाह भी भिक्षावृत्ति
दृारा ही करते है । इस घटना के समय वहाँ उपसि्थत अन्य व्यक्तियों
की भी ऐसी ही धोरणा थी । परंतु उनसे पूछने का साहस किसे था
। बाबा के चक्की पीसने का समाचार शीघ्र ही सारे गाँव में फैल
गया और उनकी यह विचित्र लीला देखने के हेतु तत्काल ही नर-
नारियों की भीड़ मसजिद की ओर दौड़ पडी़ ।
उनमें से चार निडर सि्त्रयां भीड़ को चीरता हुई ऊपर आई और
बाबा को बलपूर्वक वहाँ से हटाकर हाथ से चक्की का खूँटा
छीनकर तथा उनकी लीलाओं का गायन करते हुये उन्होंने गेहूँ
पीसना प्रारम्भ कर दिया ।
पहिले तो बाबा क्रोधित हुए, परन्तु फिर उनका भक्ति भाल
देखकर वे षान्त होकर मुस्कराने लगे । पीसते-पीसते उन सि्त्रयों के
मन में ऐसा विचार आया कि बाबा के न तो घरदृार है और न इनके
कोई बाल-बच्चे है तथा न कोई देखरेख करने वाला ही है । वे स्वयं
भिक्षावृत्ति दृारा ही निर्वाह करते हैं, अतः उन्हें भोजनाआदि
के लिये आटे की आवश्यकता ही क्या हैं । बाबा तो परम दयालु है ।
हो सकता है कि यह आटा वे हम सब लोगों में ही वितरण कर दें ।
इन्हीं विचारों में मगन रहकर गीत गाते-गाते ही उन्होंने सारा
आटा पीस डाला । तब उन्होंने चक्की को हटाकर आटे को चार
समान भागों में विभक्त कर लिया और अपना-अपना भाग लेकर
वहाँ से जाने को उघत हुई । अभी तक शान्त मुद्रा में निमग्न बाब
तत्क्षण ही क्रोधित हो उठे और उन्हें अपशब्द कहने लगे- सि्त्रयों
क्या तुम पागल हो गई हो । तुम किसके बाप का माल हडपकर ले
जा रही हो । क्या कोई कर्जदार का माल है, जो इतनी आसानी
से उठाकर लिये जा रही हो । अच्छा, अब एक कार्य करो कि इस
अटे को ले जाकर गाँव की मेंड़ (सीमा) पर बिखेर आओ ।
मैंने शिरडीवासियों से प्रश्न किया कि जो कुछ बाबा ने अभी
किया है, उसका यथार्थ में क्या तात्पर्य है । उन्होने मुझे बतलाया
कि गाँव में विषूचिका (हैजा) का जोरो से प्रकोप है और उसके
निवारणार्थ ही बाबा का यह उपचार है । अभी जो कुछ आपने
पीसते देखा था, वह गेहूँ नहीं, वरन विषूचिका (हैजा) थी, जो
पीसकर नष्ट-भ्रष्ट कर दी गई है । इस घटना के पश्चात सचमुच
विषूचिका की संक्रामतकता शांत हो गई और ग्रामवासी सुखी
हो गये ।
यह जानकर मेरी प्रसन्नता का पारावार न रहा । मेरा कौतूहल
जागृत हो गया । मै स्वयं से प्रश्न करने लगा कि आटे और विषूचिका
(हैजा) रोग का भौतिक तथा पारस्परिक क्या सम्बंध है । इसका
सूत्र कैसे ज्ञात हो । घटना बुदिगम्य सी प्रतीत नहीं होती । अपने
हृतय की सन्तुष्टि के हेतु इस मधुर लीला का मुझे चार शब्दों में महत्व
अवश्य प्रकट करना चाहिये । लीला पर चिन्तन करते हुये मेरा हृदय
प्रफुलित हो उठा और इस प्रकार बाब का जीवन-चरित्र लिखने के
लिये मुझे प्रेरणा मिली । यह तो सब लोगों को विदित ही है कि
यह कार्य बाबा की कृपा और शुभ आशीर्वाद से सफलतापूर्वक
सम्पन्न हो गया ।
आटा पीसने का तात्पर्य
शिरडीवासियों ने इस आटा पीसने की घटना का जो अर्थ
लगाया, वह तो प्रायः ठीक ही है, परन्तु उसके अतिरिक्त मेरे
विचार से कोई अन्य भी अर्थ है । बाब शिरड़ी में 60 वर्षों तक रहे
और इस दीर्घ काल में उन्होंने आटा पीसने का कार्य प्रायः
प्रतिदिन ही किया । पीसने का अभिप्राय गेहूँ से नहीं, वरन् अपने
भक्तों के पापो, दुर्भागयों, मानसिक तथा शाशीरिक तापों से
था । उनकी चक्की के दो पाटों में ऊपर का पाट भक्ति तथा नीचे
का कर्म था । चक्की का मुठिया जिससे कि वे पीसते थे, वह था
ज्ञान । बाबा का दृढ़ विश्वास था कि जब तक मनुष्य के हृदय से
प्रवृत्तियाँ, आसक्ति, घृणा तथा अहंकार नष्ट नहीं हो जाते,
जिनका नष्ट होना अत्यन्त दुष्कर है, तब तक ज्ञान तथा
आत्मानुभूति संभव नहीं हैं ।
यह घटना कबीरदास जी की उसके तदनरुप घटना की स्मृति
दिलाती है । कबीरदास जी एक स्त्री को अनाज पीसते देखकर
अपने गुरू निपतिनिरंजन से कहने लगे कि मैं इसलिये रुदन कर रहा हूँ कि
जिस प्रकार अनाज चक्की में पीसा जाता है, उसी प्रकार मैं भी
भवसागर रुपी चक्की में पीसे जाने की यातना का अनुभव कर रहा
हूँ । उनके गुरु ने उत्तर दिया कि घबड़ाओ नही, चक्की के केन्द्र में जो
ज्ञान रुपी दंड है, उसी को दृढ़ता से पकड़ लो, जिस प्रकार तुम मुझे
करते देख रहे हो ष उससे दूर मत जाओ, बस, केन्द्र की ओप ही अग्रसर
होते जाओ और तब यह निशि्चत है कि तुम इस भवसागर रुपी चक्की
से अवश्य ही बच जाओगे ।
।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।
Monday, September 21, 2015
【【 साँई तुम बिन ..मेरा हाल 】】
साँई तुम बिन मेरा ऐसा है हाल
समझो कि जीवन हुआ है बेहाल
ज्यो बिन व्यंजनों के रीति हो थाली
जीवन हुआ जैसे बिन खुशियो के खाली
ज्यो बिन बरसात के हो सावन
बिन कान्हाजी के हो वृन्दावन
ज्यो बिन माँ का हो कोई बच्चा
बिन प्रेम के रिश्ता रह जाये कच्चा
ज्यो कुमकुम बिन हो सुहागन
बिन तुलसी के हो इक आँगन
बिन अर्थ के ज्यो बाते करना
बिन पानी के ज्यो हो इक झरना
ज्यो बिन पुष्पो के हो इक बगिया
ज्यो बिन लक्ष्य बिता दे हम सदियाँ
ज्यो बिन वृक्ष के हो उसकी जड़ मूल
ज्यो बिन शिव शम्भु के हो त्रिशूल
साँई बिन कुछ युही हो जाता है मेरा हाल
मन तन में सुर रहते न रहती कोई ताल
अब बाबा तुम नजरो से न होना इक पल दूर
नही तो जीते जी मर जायेंगे हम साँई हुज़ूर
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