Tuesday, October 6, 2015

श्री साँई सच्चरित्र अध्याय 7

श्री साई सच्चरित्र अध्याय 7

श्री साई सच्चरित्र
अध्याय 7 - अदभुत अवतार । श्री साईबाबा की प्रकृति, उनकी
यौगिक क्रयाएँ, उनकी सर्वव्यापकता, कुष्ठ रोगी की सेवा,
खापर्डे के पुत्र प्लेग, पंढरपुर गमन, अदभुत अवतार
श्री साईबाबा की समस्त यौगिक क्रियाओं में पारंगत थे । 6
प्रकार की क्रियाओं के तो वे पूर्ण ज्ञाता थे । 6 क्रियायें,
जिनमें धौति ( एक 3 चौड़े व 22 ½ लम्बे कपड़े के भीगे हुए टुकड़े से पेट
को स्वच्छ करना), खण्ड योग (अर्थात् अपने शरीर के अवयवों को
पृथक-पृथक कर उन्हें पुनः पूर्ववत जोड़ना) और समाधि आदि भी
सम्मिलित हैं । यदि कहा जाये कि वे हिन्दू थे तो आकृति से वे
यवन-से प्रतीत होते थे । कोई भी यह निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता
था कि वे हिन्दू थे या यवन । वे हिन्दुओं का रामनवमी उत्सव
यथाविधि मनाते थे और साथ ही मुसलमानों का चन्दनोत्सव भी ।
वे उत्सव में दंगलों को प्रोत्साहन तथा विजेताओं को पर्याप्त
पुरस्कार देते थे । गोकुल अष्टमी को वे गोपाल-काला उत्सव भी
बड़ी धूमधाम से मनाते थे । ईद के दिन वे मुसलमानों को मसजिदमें
नमाज पढ़ने के लिये आमंत्रित किया करते थे । एक समय मुहर्रम के
अवसर पर मुसलमानों ने मसजिद में ताजिये बनाने तथा कुछ दिन
वहाँ रखकर फिर जुलूस बनाकर गाँव से निकालने का कार्यक्रम रचा
। श्री साईबाबा ने केवल चार दिन ताजियों को वहाँ रखने दिया
और बिना किसी राग-देष के पाँचवे दिन वहाँ से हटवा दिया ।
यदि कहें कि वे यवन थे तो उनके कान (हिन्दुओं की रीत् के अनुसार)
थिदे हुए थे और यदि कहें कि वे हिन्दू थे तो वे सुन्ता कराने के पक्ष में
थे । (नानासाहेब चाँदोरकर, जिन्होंने उनको बहुत समीप से देखा
था, उन्होंने बतलाया कि उनकी सुन्नत नहीं हुई थी । साईलीला-
पत्रिका श्री. बी. व्ही. देव दृारा लिखित शीर्षक बाबा यवन
की हिन्दू पृष्ठ 562 देखो ।) यदि कोई उन्हें हिन्दू घोषित करें तो वे
सदा मसजिद में निवास करते थे और यदि यवन कहें तो वे सदा वहाँ
धूनी प्रज्वलित रखते थे तथा अन्य कर्म, जो कि इस्लाम धर्म के
विरुदृ है, जैसे - चक्की पीसना, शंख तथा घंटानाद, होम आदिक
कर्य करना, अन्नदान और अघ्र्य दृारा पूजन आदि सदैव वहाँ चलते
रहते थे ।
यदि कोई कहे गि वे यवन थे तो कुलीन ब्राहमण और अग्निहोत्री
भी अपने नियमों का उल्लंघन कर सदा उनको साष्टांग नमस्कार
ककिया करते थे । जो उलके स्वदेश का पता लगाने गये, उन्हें अपना
प्रश्न ही विस्मृत हो गया और वे उनके दर्शनमात्र से मोहित हो
गया । अस्तु इसका निर्णय कोई न कर सका कि यथार्थ में
साईबाबा हिन्दू थे या यवन । इसमें आश्चर्य ही क्या है जो अहं व
इन्द्रियजन्य सुखों को तिलांजजलि देकर ईश्वर की शरण में आ
जाता है तथा जब उसे ईश्वर के साथ अभिन्नता प्राप्त हो जाती
है, तब उसकी कोई जाति-पाति नहीं रह जाती । इसी कोटि में
श्री साईबाबा थे । दे जातियों और प्राणियों में किंचित् मात्र
भी भेदभाव नहीं रखते थे । फकीरों के साथ वे अमिष और मछलीका
सेवन भी कर लेते थे । कुत्ते भी उनके भोजन-पात्र में मुँह डालकर
स्वतंत्रतापूर्वक खाते थे, परन्तु उन्होंने कभी कोई भी आपत्चि नहीं
की । ऐसा अपूर्व और अद्भभुत श्री साईबाबा का अवतार था ।
गत जन्मों के शुभ संस्कारों के परिणामस्वरुप मुझे भी उनके श्री
चरणों के समीर बैठने और उनका सत्संग-लाभ उठाने का सौभाग्य
प्राप्त हुआ । मुझे जिस आनन्द व सुख का अनुभव हुआ, उसका वर्णन
मैं किस प्रकार कर सकता हूँ । यथार्थ में बाबा अखण्ड
सच्चिदानन्द थे । उनकी महानता और अदितीय का बखान कौन
कर सकता है । जिसने उनके श्री चरण-कमलों की शरण ली, उसे
साक्षात्कार की प्राप्ति हुई । अनेक सन्यासी, साधक और अन्य
मुमुक्षु जन भी श्री साईबाबा के पास आया करते थे । बाबा भी
सदैव उलके साथ चलते-फिरते, उठते-बैठते, उनसे वार्तालाप कर उनका
चित्तरंजन किया करते थे । अल्लाह मालिक सदैव उनके होठों पर
था । वे कभी भी विवाद और मतभेद में नहीं पडते थे तथा सदा
शान्त और स्थिर रहते थे । परन्तु कभी-कभी वे क्रोधित हो जाया
करते थे । वे सदैव ही वेदान्त की शिक्षा दिया करते थे । अमीर और
गरीब दोनों उनके लिए एक समान थे । वे लोगों के गुहा व्यापार
को पूर्णतया जानते थे और जब वे गुहा रहस्य स्पष्ट करते तो सब
विस्मत हो जाते थे । स्वयं ज्ञानावतार होकर भी वे सदैव
अज्ञानता का प्रदर्शन किया करते थे । उन्हें आदरसत्कार से सदैव
अरुचि थी । इस प्रकार का श्री साईबाबा का वैशिष्टय था । थे
तो वे शरीरधारी, परन्तु कर्मों से उनकी ईश्वरीयता स्पष्ट झलकती
थी । शिरडी के सकल नर-नारी उन्हें परब्रहमा ही मानते थे ।
विशेषः -
श्री साईबाबा के एक अंतरंग भक्त म्हालसापति, जो कि बाबा के
साथ मसजिद तता चावड़ी में शयन करते थे, उन्हें बाबा ने बतलाया
था कि मेरा जन्म पाथर्डी के एक ब्राहमण परिवार में हुआ था । मेरे
माता-पिता ने मुझे बाल्यावस्था में ही एक फकीर को सौंप
दिया था । जब यह चर्चा चल रही थी, तभी पाथर्डी से कुछ लोग
वहाँ आये तथा बाबा ने उनसे कुछ लोगों के सम्बन्ध में पुछताछ भी
की ।
श्रीमती काशीबाई कानेटकर (पूना की एक प्रसिदृ विदुषी
महिला) ने साईलीला-पत्रिका, भाग 2 (सन् 1934) के पृष्ठ 79 पर
अनुभव नं. 5 में प्रकाशित किया है कि बाबा के चमत्कारों को
सुनकर हम लोग अपनी ब्रहमवादी समस्था की पदृति के अनुसार
विवेचन कर रहे थे । विवाद का विषय था कि श्री साईबाबा
ब्रहमवादी हैं या वाममार्गी । कालान्तर में जब मैं शिरडी को गई
ते मुझे इस सम्वन्ध में अनेक विचार आ रहे थे । जैसे ही मैंने मसजिद की
सीढ़ियों पर पैर रखा कि बाबा उठ कर सामने आ गये और अपने हृदय
की ओर संकेत कर, मेरी ओर घुरते हुये क्रोधित हो बोले – यह
ब्राहमण है, शुदृ ब्राहमण । इसे वाममार्ग से क्या प्रयोजन यहाँ कोई
भी यवन प्रवेश करने का दुस्साहस नहीं कर सकता और न ही वह करे ।
पुनः अपने हृदय की ओर इंगित करते हुयो बोले, या ब्राहमण लाखो
मनुष्यों का पथ प्रदर्शन कर सकता है और उनको अप्राप्य वस्तु की
प्राप्ति करा सकता है । यह ब्राहमण की मसजिद है । मै यहाँ
किसी वाममार्गी की छाया भी न पडने दूँगा ।
बाबा की प्रकृति
मैं मूर्ख जो हूँ, श्री साईबाबा की अद्भभुत लीलाओं का वर्णन
नहीं कर सकता । शिरडी के प्रायः समस्त मंदिरों का उन्होंने
जीर्णोधार किया । श्री तात्या पाटील के दृारा शनि, गणरति,
शंकर, पार्वती, ग्राम्यदेवता और हनुमानजी आदि के मंदिर ठीक
करवाये । उनका दान भी विलक्षण था । दक्षिणा के रुप में जो धन
एकत्रित होता था, उसमें से वे किसी को बीस रुपये, किसी को
पंद्रह रुपये या किसी को पचास रुपये, इसी प्रकार प्रतिदिन
स्वच्छन्दतापूर्वक वितरण कर देते थे । प्राप्तिकर्ता उसे शुदृ दान
समझता था । बाबा की भी सदैव यही इच्छा थी कि उसका
उपयुक्त रीति से व्यय किया जाय ।
बाबा के दर्शन से भक्तों को अनेक प्रकार का लाभ पहुँचता था ।
अनेकों निष्कपट और स्वस्थ बन गये, दुष्टात्मा पुण्यातमा में परिणत
हो गये । अनेकों कुष्ठ रोग से मुक्त हो गए और अनेकों को
मनोवांछित फल की प्राप्ति हो गई । बिना कोई रस या औषधि
सेवन किये, बहुत से अंधों को पुनः दृष्टि प्राप्त हो गई, पंगुओं की
पंगुता नष्ट हो गई । कोई भी उनकी महानता का अन्त न पा सका
। उनकी कीर्ति दूर-दूर तक फैलती गई और भिन्न-भिन्न स्थानों से
यात्रियों के झुंड के झुंड शिरडी औने लगे । बाबा सदा धूनी के पास
ही आसन जमाये रहते और वहीं विश्राम किया करते थे । वे कभी
स्नान करते और कभी स्नान किये बिना ही समाधि में लीन रहते थे
। वे सिर पर एक छोटी सी साफी, कमर में एक धोती और तन ढँकने के
लिए एक अंगरखा धारण करते थे । प्रारम्भ से ही उनकी वेशभूषा
इसी प्रकार थी । अपने जीवनकाल के पू्र्वार्दृ में वे गाँव में
चिकित्साकार्य भी किया करते थे । रोगियों का निदान कर
उन्हें औषधि भी देते थे और उनके हाथ में अपरिमित यश था । इस
कारण से वे अल्प काल में ही योग्य चिकित्सक विख्यात हो गये ।
यहाँ केवल एक ही घटना का उल्लेख किया जाता है, जो बड़ी
विचित्र सी है ।
विलक्षण नेत्र चिकित्सा
एक भक्त की आँखें बहुत लाल हो गई थी । उन पर सूजन भी आ गई थी
। शिरडी सरीखे छोटे ग्राम में डाक्टर कहाँ । तब भक्तगण ने रोगी
को बाबा के समक्ष उपस्थित किया । इस प्रकार की पीडा में
डाँक्टर प्रायः लेप, मरहम, अंजन, गाय का दूध तथा कपूरयुक्त
औषधियों को प्रयोग में लाते हैं । पर बाबा की औषधि तो
सर्वथा ही भिन्न थी । उन्होंने भिलावाँ पीस कर उसकी दो
गोलियाँ बनायीं और रोगी के नेत्रों में एक-एक गोली चिपका कर
करड़े की पट्टी से आँखें बाँध दी । दूसरे दिन पट्टी हटाकर नेत्रों के
ऊपर जल के छींटे छोड़े गये । सूजन कम हो गई और नेत्र प्रायः
नीरोग हो गये । नेत्र शरीर का एक अति सुकोमल अंग है, परन्तु
बाबा की औषधि से कोई हानि नहीं पहुँची, वरन् नेत्रों की
व्याधि दूर हो गई । इस प्रकार अनेक रोगी नीरोग हो गये । यह
घटना तो केवन उदाहरणस्वरुप ही यहाँ लिखी गई है ।
बाबा की यौगिक क्रियाएँ
बाबा को समस्त यौगिक प्रयोग और क्रियाएँ ज्ञात थी । उनमें
से केवल दो का ही उल्लेख यहाँ किया जाता है –
धौति क्रिया (आतें स्वच्छ करने की क्रिया) - प्रति तीसरे दिन
बाबा मसजिद से प्रयाप्त दूरी पर, एक वट वृक्ष के नीचे किया करते
थे । एक अवसर पर लोगों ने देखा कि उन्होंने अपनी आँतों को उदर
के बाहर निकालकर उन्हें चारों ओर से स्वच्छ किया और समीप के
वृक्ष पर सूखने के लिये रख दिया । शिरडी में इस घटना की पुष्टि
करने वाले लोग अभी भी जीवित हैं । उन्होंने इस सत्य की
परीक्षा भी की थी ।
साधारण धौति क्रिया एक 3” चौडे व 22 ½ फुट लम्वे गीले कपड़े के
टुकड़े से की जाती है । इस कपड़े को मुँह के दृारा उदर में उतार लिया
जाता हैं तथा इसे लगभग आधा घंटे तक रखे रहते है, ताकि उसका
पूरा-पूरा प्रभाव हो जावे । तत्पश्चात् उसे बाहर निकाल लेते
निकाल लेते हैं । पर बाबा की तो यह धौति क्रिया सर्वथा
विचित्र और असाधारण ही थी ।
खण्डयोग – एक समय बाबा ने अपने शरीर के अवयव पृथक-पृथक कर
मसजिद के भिन्न-भिन्न स्थानों में बिकेर दिये । अकस्मात् उसी
दिन एक महाशय मसजिद में पधारे और अंगों को इस प्रकार यहाँ-
वहाँ बिखरा देखकर बहुत ही भयभीत हुए । पहले उनकी इच्छा हुई
कि लौटकर ग्राम अधिकारी के पास यह सूचना भिजवा देनी
चाहिये कि किसी ने बाबा का खून कर उनके टुकडे-टुकडे कर दिये हैं
। परन्तु सूचना देने वाला ही पहले पकड़ा जाता हैं, यह सोचकर वे
मौन रहे । दूसरे दिन जब वे मसजिद में गये तो बाबा को पूर्ववत् हष्ट
पुषट ओर स्वस्थ देखकर उन्हें बड़ा विस्मय हुआ । उन्हें ऐसा लगा कि
पिछले दिन जो दृश्य देखा था, वह कहीं स्वप्न तो नहीं था ।
बाबा बाल्याकाल से ही यौगिक क्रियायें किया करते थे और
उन्हें जो अवस्था प्राप्त हो चुकी थी, उसका सत्य ज्ञान किसी
को भी नहीं था । चिकित्सा के नाम से उन्होंने कभी किसी से
एक पैसा भी स्वीकार नहीं किया । अपने उत्तम लोकप्रिय गुणों
के कारण उनकी कीर्ति दूर-दूर तक फैल गई । उन्होंने अनेक निर्धनों
और रोगियों को स्वास्थ्य प्रदान किया । इस प्रसिदृ डाँक्टरों के
डाँक्टर (मसीहों के मसीहा) ने कभी अपने स्वार्थ की चिन्ता न
कर अनेक विघनों का सामना किया तथा स्वयं असहनीय वेदना
और कष्ट सहन कर सदैव दूसरों की भलाई की और उन्हें विपत्तियों में
सहायता पहुँचाई । वे सदा परकल्याणार्थ चिंतित रहते थे । ऐसी एक
घटना नीचे लिखी जाती है, जो उनकी सर्वव्यापकता तथा महान्
दयालुता की घोतक हैं ।
बाबा की सर्वव्यापकता और दयालुता
सन् 1910 में बाबा दीवाली के शुभ अवसर पर धूनी के समीप बैठे हुए
अग्नि ताप रहे थे तथा साथ ही धूनी में लकड़ी भी डालते जी रहे थे
। धूनी प्रचण्डता से प्रज्वलित थी । कुछ समय पश्चात उन्होने
लकड़ियाँ डालने के बदने अपना हाथ धूनी में डाल दिया । हाथ बुरी
तरह से झुलस गया । नौकर माधव तथा माधवराव देशपांडे ने बाबा
को धूनी में हाथ डालते दोखकर तुरन्त दौड़कर उन्हें बलपूर्वक पीछे
खींच लिया ।
माधवराव ने बाबा से कहा, देवा आपने ऐसा क्यों किया । बाबा
सावधान होकर कहने लगे, यहाँ से कुछ दूरी पर एक लुहारिन जब
भट्टी धौंक रही थी, उसी समय उसके पति ने उसे बुलाया । कमर से
बँधे हुए शिशु का ध्यान छोड़ वह शीघ्रता से वहाँ दौड़क गई ।
अभाग्यवश शिशु फिसल कर भट्टी में गिर पड़ा । मैंने तुरन्त भट्टी में
हाथ डालकर शिशु के प्राण बचा लिये हैं । मुझे अपना हाथ जल
जाने का कोई दुःख नहीं हैं, परन्तु मुझे हर्ष हैं कि एक मासूम शिशु के
प्राण बच गये ।
कुष्ठ रोगी की सेवा
माधवराव देशपांडे के दृारा बाबा का हाथ जल जाने का
समाचार पाकर श्री नानासाहेव चाँदोरकर, बम्बई के सुप्रसिदृ
डाँक्टर श्री परमानंद के साथ दवाईयाँ, लेप, लिंट तथा पट्टियाँ
आदि साथ लेकर शीघ्रता से शिरडी को आये । उन्होंने बाबा से
डाँक्टर परमानन्द को हाथ की परीक्षा करने और जले हुए स्थान में
दवा लगाने की अनुमति माँगी । यह प्रार्थना अस्वीकृत हो गई ।
हाथ जल जाने के पश्चात एक कुष्ठ-पीडित भक्त भागोजी
सिंदिया उनके हाथ पर सदैव पट्टी बाँधते थे । उनका कार्य था
प्रतिदिन जले हुए स्थान पर घी मलना और उसके ऊपर एक पत्ता
रखकर पट्टियों से उसे पुनः पूर्ववत् कस कर बाँध देना । घाव शीघ्र
भर जाये, इसके लिये नानासाहेब चाँदोरकर ने पट्टी छोड़ने तथा
डाँ. परमानन्द से जाँच व चिकित्सा कराने का बाबा से बारंबार
अनुरोध किया । यहाँ तक कि डाँ. परमानन्द ने भी अनेक बार
प्रर्थना की, परन्तु बाबा ने यह कहते हुए टाल दिया कि केवल
अल्लाह ही मेरा डाँक्टर है । उन्होंने हाथ की परीक्षा करवाना
अस्वीकार कर दिया । डाँ. परमानन्द की दवाइयाँ शिरडी के
वायुमंडल में न खुल सकीं और न उनका उपयोग ही हो सका । फिर
भी डाँक्टर साहेव की अनुमति मिल गई । कुछ दिनों के उपरांत जब
घाव भर गया, तब सब भक्त सुखी हो गये, परन्तु यह किसी को भी
ज्ञात न हो सका कि कुछ पीडा अवशेष रही थी या नहीं ।
प्रतिदिन प्रातःकाल वही क्रम-घृत से हाथ का मर्दन और पुनः
कस कर पट्टी बाँधना-श्री साई बाबा की समाधि पर्यन्त यह
कार्य इसी प्रकार चलता रहा । श्री साई बाबा सदृश पूर्ण सिदृ
कको, यथार्थ में इस चिकित्सा की भी कोई आवश्यकता नहीं थी,
परन्तु भक्तों के प्रेमवश, उन्होंने भागोजी की यह सेवा (अर्थात्
उपासना) निर्विघ्र स्वीकार की । जब बाबा लेण्डी को जाते
तो भागोजी छाता लेकर उनके साथ ही जाते थे । प्रतिदिन
प्रातःकाल जब बाबा धूनी के पास आसन पर विराजते, तब
भागोजी वहाँ पहले से ही उपस्थित रहकर अपना कार्य प्रारम्भ
कर देते थे । भागोजी ने पिछले जन्म में अनेक पाप-कर्म किये थे । इस
कारण वे कुष्ठ रोग से पीड़ित थे । उनकी उँगलियाँ गल चुकी थी और
शरीर पीप आदि से भरा हुआ था, जिससे दुर्गन्ध भी आती थी ।
यघपि बाहृ दृष्टि से वे दुर्भागी प्रतीत होते थे, परंतु बाबा का
प्रधान सेवक होने के नाते, यथार्थ में वे ही अधिक भाग्यशाली
तथा सुखी थे । उन्हें बाबा के सानिध्य का पपूर्ण लाभ प्राप्त हुआ

बालक खापर्डे को प्लेग
अब मैं बाबा की एक दुसरी अद्भभुत लीला का वर्णन करुँगा ।
श्रीमती खापर्डे (अमरावती के श्री दादासाहेब खापर्डे की
धर्मपत्नी) अपने छोटे पुत्र के साथ कई दिनों से शिरडी में थी । पुत्र
तीव्र ज्वर से पीड़ित था, पश्चात उसे प्लेग की गिल्टी (गाँठ) भी
निकल आई । श्रीमती खापर्डे भयभीत हो बहुत घबराने लगी और
अमरावती लौट जाने का विचार करने लगी । संध्या-समय जब
बाबा वायुसेवन के लिए वाड़े (अब जो समाधि मंदिर कहा जाता
है) के पास से जा रहे थे, तब उन्होंने उनसे लौटने की अनुमति माँगी
तथा कम्पित स्वर में कहने लगी कि मेरा प्रिय पुत्र प्लेग से ग्रस्त हो
गया है, अतः अब मैं घर लौटना चाहती हूँ । प्रेमपूर्वक उनका
समाधान करते हुए बाबा ने कहा, आकाश में बहुत बादल छाये हुए हैं ।
उनके हटते ही आकाश पूर्ववत् स्वच्छ हो जायगा । ऐसा कहते हुए
उन्होंने कमर तक अपनी कफनी ऊपर उठाई और वहाँ उपस्थित सभी
लोगों को चार अंडों के बराबर गिल्टियाँ दिखा कर कहा, देखो,
मुझे अपने भक्तों के लिये कितना कष्ट उठाना पड़ता हैं । उनके कष्ट
मेरे हैं । यह विचित्र और असाधारण लीला दिखकर लोगों को
विश्वास हो गया कि सन्तों को अपने भक्तों के लिये किस
प्रकार कष्ट सहन करने पड़ते हैं । संतों का हृदय मोम से भी नरम तथा
अन्तर्बाहृ मक्खन जैसा कोमन होता है । वे अकारण ही भक्तों से
प्रेम करते और उन्हे अपना निजी सम्बंधी समझते हैं ।
पंढरपुर-गमन और निवास
बाबा अपने भक्तों से कितना प्रेम करते और किस प्रकार उनकी
समस्त इच्छाओं तथा समाचारों को पहने से ही जान लेते थे, इसका
वर्णन कर मैं यह अध्याय समाप्त करुँगा ।
नानासाहेव चाँदोरकर बाबा के परम भक्त थे । वे खानदेश में
नंदुरबार के मामलतदार थे । उनका पंढरपुर को स्थानांतरण हो गया
और श्री साई बाबा की भक्ति उन्हें सफल हो गई, क्योंकि उन्हें
पंढरपुर जो भूवैकुण्ठ (पृख्वी का स्वर्ग) सदृश ही साझा जाता है,
उसमें रहने का अवसर प्राप्त हो गया । नानासाहेव के शीघ्र ही
कार्यभार सम्हालना था, इसलिये वे किसी के पूर्व पत्र या सूचना
दिये बिना ही शीघ्रता से शिरडी को रवाना हो गये । वे अपने
पंढरपुर (शिरडी) में अचानक ही पहुँचकर अपने विठोबा (बाबा) को
नमस्कार कर फिर आगे प्रस्थान करना चाहते थे । नानासाहेब के
आगमन की किसी को भी सूचना न थी । परन्तु बाबासे क्या
छिपा था । वे तो सर्वज्ञ थे । जैसे ही नानासाहेब नीमगाँव पहुँचे
(जो शिरडी से कुछ ही दूरी पर है), बाबा पास बैठे हुए
म्हालसापति, अप्पा शिंदे और काशीराम से वार्तालाप कर रहे थे
। उसी समय मसजिद में स्तब्धता छा गई और बाबा ने अचानक ही
कहा, चलो, चारों मिलकर भजन करें । पंढरपुर के दृार खुले हुए हैं – यह
भजन प्रेमपूर्वक गावें । (पंढरपुरला जायाचें जायाचें तिथेंच मजला
राह्याचें । तिथेच मजला राह्याचे, घर तें माईया रायांचे ।।) सब
मिलकर गाने लगे । (भावार्थ-मुझे पंढरपुर जाकर वहीं रहना है,
क्योंकि वह मेरे स्वामी (ईश्वर) का घर है ।) बाबा गाते जाते और
दुहराते जाते थे । कुछ समय में नानासाहेब ने वहाँ सहकुटुम्ब पहुँचकर
बाबा को प्रणाम किया । उन्होंने बाबासे पंढरपुर को साथ
पधारने तथा वहाँ निवास करने की प्रार्थना की । पाठकों अब
इस प्रार्थना की आवश्यकता ही कहाँ थी । भक्तगण ने
नानासाहेब को बतलाया कि बाबा पंढरपुर निवास के भाव में
पहने ही से हैं । यह सुनकर नानासाहेब द्रवित हो श्री-चरणों पर गिर
पड़े और बाबा की आज्ञा, उदी तथा आर्शीवाद प्राप्त कर वे
पंढरपुर को रवाना हो गये ।
बाबा की कथाये अनन्त है । अन्य विषय जैसे – मानव जन्म का
महत्व, बाबा का भिक्षा-वृत्ति पर निर्वाह, बायजाबई की सेवा
तथा अन्य कथाओं को अगने अध्याय के लिये शेष रखकर अब मुझे यहाँ
विश्राम करना चाहिये ।
।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

Monday, October 5, 2015

श्री साँई सच्चरित्र अध्याय 6

।। श्री साँई सच्चरित्र अध्याय 6 ।।

श्री साई सच्चरित्र अध्याय 6
श्री साई सच्चरित्र
अध्याय 6 - रामनवमी उत्सव व मसजिद का जीर्णोदृार, गुरु के कर-
स्पर्श की महिमा, रामनवमी—उत्सव, उर्स की प्राथमिक अवस्था
ओर रुपान्तर एवम मसजिद का जीर्णोदृार
गुरु के कर-स्पर्श के गुण
जब सद्गगुरु ही नाव के खिवैया हों तो वे निश्चय ही कुशलता तथा
सरलतापूर्वक इस भवसागर के पार उतार देंगे । सद्गगुरु शब्द का
उच्चारण करते ही मुझे श्री साई की स्मृति आ रही है । ऐसा प्रतीत
होता है, मानो वो स्वयं मेरे सामने ही खड़े है और मेरे मस्तक पर उदी
लगा रहे हैं । देखो, देखो, वे अब अपनग वरद्-हस्त उठाकर मेरे मस्तक पर
रख रहे है । अब मेरा हृदय आनन्द से भर गया है । मेरे नेत्रों से प्रेमाश्रु
बह रहे है । सद्गगुरु के कर-स्पर्श की शक्ति महान् आश्चर्यजनक है ।
लिंग (सूक्ष्म) शरीर, जो संसार को भष्म करने वाली अग्नि से भी
नष्ट किया जा सकता है, वह केवल गुरु के कर-स्पर्श से ही पल भर में
नष्ट हो जाता है । अनेक जन्मों के समस्त पाप भी मन स्थिर हो
जाते है । श्री साईबाबा के मनोहर रुप के दर्शन कर कंठ प्रफुल्लता से
रुँध जाता है, आँखों से अश्रुधारा प्रवाहित होने लगती है और जब
हृदय भावनाओं से भर जाता है, तब सोडहं भाव की जागृति होकर
आत्मानुभव के आननन्द का आभास होने लगता है । मैं और तू का भेद
(दैृतभाव) नष्ट हो जाता है और तत्क्षण ही ब्रहृा के साथ
अभिन्नता प्राप्त हो जाती है । जब मैं धार्मिक ग्रन्थों का पठन
करता हूँ तो क्षण-क्षण में सद्गगुरु की स्मृति हो आती है । बाबा
राम या कृष्ण का रुप धारण कर मेरे सामने खड़े हो जाते है और स्वयं
अपनी जीवन-कथा मुझे सुनाने लगते है । अर्थात् जब मैं भागवत का
श्रवण करता हूँ, तब बाबा श्री कृष्ण का स्वरुप धारण कर लेते हैं और
तब मुझे ऐसा प्रतीत होने लगता है कि वे ही भागवत या भक्तों के
कल्याणार्थ उदृवगीता सुना रहे है । जब कभी भी मै किसी से
वार्त्लाप किया करता हूँ तो मैं बाबा की कथाओं को ध्यान में
लाता हूँ, जिससे उनका उपयुक्त अर्थ समझाने में सफल हो सकूँ । जब
मैं लिखने के लिये बैठता हूँ, तब एक शब्द या वाक्य की रचना भी
नहीं कर पाता हबँ, परन्तु जब वे स्वयं कृपा कर मुझसे लिखवाने लगते
है, तब फिर उसका कोई अंत नहीं होता । जब भक्तों में अहंकार की
वृदिृ होने लगती है तो वे शक्ति प्रदान कर उसे अहंकारशून्य बनाकर
अंतिम ध्येय की प्राप्ति करा देते है तथा उसे संतुष्ट कर अक्षय सुख
का अधिकारी बना देते है । जो बाबा को नमन कर अनन्य भाव से
उनकी शरण जाता है, उसे फिर कोई साधना करने की आवस्यकता
नहीं है । धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष उसे सहज ही में प्राप्त हो जाते
हैं । ईश्वर के पास पहुँचने के चार मार्ग हैं – कर्म, ज्ञान, योग और
भक्ति । इन सबमें भक्तिमार्ग अधिक कंटकाकीर्ण, गडढों और
खाइयों से परिपूर्ण है । परन्तु यदि सद्गगुरु पर विश्वास कर गडढों
और खाइयों से बचते और पदानुक्रमण करते हुए सीधे अग्रसर होते
जाओगे तो तुम अपने ध्येय अर्थात् ईश्वर के समीप आसानी से पहुँच
जाओगे । श्री साईबाबा ने निश्चयात्मक स्वर में कहा है कि स्वयं
ब्रहा और उनकी विश्व उत्पत्ति, रक्षण और लय करने आदि की
भिन्न-भिन्न शक्तियों के पृथकत्व में भी एकत्व है । इसे ही
ग्रन्थकारों ने दर्शाया है । भक्तों के कल्याणार्थ श्री साईबाबा
ने स्वयं जिन वचनों से आश्वासन दिया था, उनको नीचे उदृत किया
जाता है –
मेरे भक्तों के घर अन्न तथा वस्त्रों का कभी अभाव नहीं होगा ।
यह मेरा वैशिष्टय है कि जो भक्त मेरी शरण आ जाते है ओर
अंतःकरण से मेरे उपासक है, उलके कल्याणार्थ मैं सदैव चिंतित रहता
हूँ । कृष्ण भगवान ने भी गीता में यही समझाया है । इसलिये भोजन
तथा वस्त्र के लिये अधिक चिंता न करो । यदि कुछ मांगने की ही
अभिलाषा है तो ईश्वर को ही भिक्षा में माँगो । सासारिक
मान व उपाधियाँ त्यागकर ईश-कृपा तथा अभयदान प्राप्त करो
और उन्ही के दृारा सम्मानित होओ । सांसारिक विभूतियों से
कुपथगामी मत बनो । अपने इष्ट को दृढ़ता से पकड़े रहो । समस्त
इन्द्रियों और मन को ईश्वरचिंतन में प्रवृत रखो । किसी पदार्थ से
आकर्षित न हो, सदैव मेरे स्मरण में मन को लगाये रखो, ताकि वह
देह, सम्पत्ति व ऐश्वर्य की ओर प्रवृत न हो । तब चित्त स्थिर, शांत
व निर्भय हो जायगा । इस प्रकार की मनःस्थिति प्राप्त होना
इस बात का प्रतीक है कि वह सुसंगति में है । यदि चित्त की
चंचलता नष्ट न हुई तो उसे एकाग्र नहीं किया जा सकता ।
बाबा के उपयुक्त को उदृत कर ग्रन्थकार शिरडी के रामनवमी उत्सव
का वर्णन करता है । शिरडी में मनाये जाते वाले उत्सवों में
रामनवमी अधिक धूमधाम से मनायी जाती है । अतएव इस उत्सव
का पूर्ण विवरण जैसा कि साईलीला-पत्रिका (1925) के पृष्ठ 197
पर प्रकाशित हुआ था, यहाँ संक्षेप में दिया जाता है –
प्रारम्भ
कोपरगाँव में श्री गोपालराव गुंड नाम के एक इन्सपेक्टर थे । वे
बाबा के परम भक्त थे । उनकी तीन स्त्रियाँ थी, परन्तु एक के भी
स्थान न थी । श्री साईबाबा की कृपा से उन्हें एक पुत्र-रत्न की
प्राप्ति हुई । इस हर्ष के उपलक्ष्य में सन् 1897 में उन्हें विचार आया
कि शिरडी में मेला अथवा उरुस भरवाना चाहिये । उन्होंने यह
विचार शिरडी के अन्य भक्त-तात्या पाटील, दादा कोते
पाटील और माधवराव के समक्ष विचारणार्थ प्रगट किया । उन
सभी को यह विचार अति रुचिकर प्रतीत हुआ तथा उन्हें बाबा
की भी स्वीकृत और आश्वासन प्राप्त हो गया । उरुस भरने के लिये
सरकारी आज्ञा आवश्यक थी । इसलिये एक प्रार्थना-पत्र कलेक्टर
के पास भेजा गया, परन्तु ग्राम कुलकर्णी (पटवारी) के आपत्ति
उठाने के कारण स्वीकृति प्राप्त न हो सकी । परन्तु बाबा का
आश्वासन तो प्राप्त हो ही चुका था, अतः पुनः प्रत्यन करने पर
स्वीकृति प्राप्त हो गयी । बाबा की अनुमति से रामनवमी के
दिन उरुस भरना निश्चित हुआ । ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ
निष्कर्ष ध्यान में रख कर ही उन्होंने ऐसी आज्ञा दी । अर्थात्
उरुस व रामनवमी के उत्सवों का एकीकरण तथा हिन्दू-मुसलिम
एकता, जो भविष्य की घटनाओं से ही स्पष्ट है कि यह ध्येय पूर्ण
सफल हुआ । प्रथम बाधा तो किसी प्रकार हल हुई । अब दितीय
कठिनाई जल के अभाव की उपस्थित हुई । शिरडी तो एक छोटा
सा ग्राम था और पूर्व काल से ही वहाँ जल का अभाव बना रहता
था । गाँव में केवल दो कुएँ थे, जिनमें से एक तो प्रायः को सूख
जाया करता था और दूसरे का पानी खारा था । बाबा ने उसमें
फूल डालकर उसके खारे जल को मीठा बना दिया । लेकिन एक कुएँ
का जल कितने लोगों को पर्याप्त हो सकता था । इसलिये
तात्या पाटील ने बाहर से जल मंगवाने का प्रबन्ध किया । लकड़ी
व बाँसों की कच्ची दुकानें बनाई गई तथा कुश्तियों का भी
आयोजन किया गया । गोपालपाव गुंड के एक मित्र दामू-अण्णा
कासार अहमदनगर में रहते थे । वे भी संतानहीन होने के कारण दुःखी
थे । श्री साईबाबा की कृपा से उन्हें भी एक पुत्र-रत्न की प्राप्ति
हुई थी । श्री गुंड ने उनसे एक ध्वज देने को कहा । एक ध्वज
जागीरदार श्री नानासाहेब निमोणकर ने भी दिया । ये दोनों
ध्वज बड़े समारोह के साथ गाँव में से निकाले गये और अंत में उन्हें
मसजिद, जिसे बाबा दृारकामाई के नाम से पुकारते थे, उसके कोनों
पर फहरा दिया गया । यह कार्यक्रम अभी पूर्ववत् ही चल रहा है ।
चन्दन समारोह
इस मेले में एक अन्य कार्यक्रम का भी श्री गणेश हुआ, जो
चन्दनोत्सव के नाम से प्रसिदृ है । यह कोरहल के एक मुसलिम भक्त
श्री अमीर सक्कर दलाल के मस्तिष्क की सूझ थी । प्रायः इस
प्रकार का उत्सव सिदृ मुसलिम सन्तों के सम्मान में ही किया
जाता है । बहुत-सा चन्दन घिसकर बहुत सी चन्दन-धूप थालियों में
भरी जाती है तथा लोहवान जलाते है और अंत में उन्हें मसजिद में
पहुँचा कर जुलूस समाप्त हो जाता है । थालियों का चन्दन और धूप
नीम पर और मसजिद की दीवारों पर डाल दिया जता है । इस
उत्सव का प्रबन्ध प्रथम तीन वर्षों तक श्री. अमीर सक्कर ने किया
और उनके पश्चात उनकी धर्मपत्नी ने किया । इस प्रकार हिन्दुओं
दृारा ध्वज व मुसलमानों के दृारा चन्दन का जुलूस एक साथ चलने
लगा और अभी तक उसी तरह चल रहा है ।
प्रबन्ध
रामनवमी का दिन श्री साईबाबा के भक्तों को अत्यन्त ही
प्रिय और पवित्र है । कार्य करने के लिये बहुत से स्वयंसेवक तैयार हो
जाते थे और वे मेले के प्रबन्ध में सक्रिय भाग लेते थे । बाहर के समस्त
कार्यों का भार तात्या पाटील और भीतर के कार्यों को श्री
साईबाबा की एक परम भक्त महिला राधाकृश्ण माई सम्हिलती
थी । इस अवसर पर उनका निवासस्थान अतिथियों से परिपूर्ण
रहता और उन्हें सब लोगों की आवश्यकताओं का भी ध्यान रखना
पड़ता था । साथ ही वे मेले की समस्त आवश्यक वस्तुओं का भी
प्रबन्ध करता थीं । दूसरा कार्य जो वे स्वयं खुशी से किया करती,
वह था मसजिद की सफाई करना, चूना पोतना आदि । मसजिद
की फर्श तथा दीवारें निरन्तर धूनी जलने के कारण काली पड़ गयी
थी । जब रात्रि को बाबा चावड़ी में विश्राम करने चले जाते, तब
वे यह कार्य कर लिया करती थी । समस्त वस्तुएँ धूनी सहित बाहर
निकालनी पड़ती थी और सफई व पुताई हो जाने के पश्चात् वे
पूर्ववत् सजा दी जाती थी । बाबा का अत्यन्त प्रिय कार्य
गरीबों को भोजन कराना भी इस कार्यक्रम का एक अंग था । इस
कार्य के लिये वृहद् भोज का आयोजन किया जाता था और अनेक
प्रकार की मिठाइयाँ बनाई जाती थी । यह सब कार्य
राधाकृष्णमगई के निवासस्थान पर ही होता था । बहुत से धनाढ्य
व श्रीमंत भक्त इस कार्य में आर्थिक सहायता पहुँचाते थे ।
उर्स का रामनवमी के त्यौहार में समन्वय
सब कार्यक्रम इसी तरह उत्तम प्रकार से चलता रहा और मेले का
महत्व शनैः शनैः बढ़ता ही गया । सन् 1911 में एक परिवर्तन हुआ ।
एक भक्त कृष्णराव जोगेश्वर भीष्म (श्री साई सगुणोपासना के
लेखक) अमरावती के दादासाहेब खापर्डे के साथ मेले के एक दिन
पूर्व शिरडी के दीक्षित-वाड़े में ठहरे । जब वे दालान में लेटे हुए
विश्राम कर रहे थे, तब उन्हें एक कल्पना सूझी । इसी समय श्री.
लक्ष्मणराव उपनाम काका महाजनी पूजन सामग्री लेकर मसजिद
की ओर जा रहे थे । उन दोनों में विचार-विनिमय होने लगा ओर
उन्होने सोचा कि शिरडी में उरुस व मेला ठीक रामनवमी के दिन
ही भरता है, इसमें अवश्य ही कोई गुढ़ रहस्य निहित है । रामनवमी
का दिन हिन्दुओं को बहुत ही प्रिय है । कितना अच्छा हो, यदि
रामनवमी उत्सव (अर्थात् श्री राम का जन्म दिवस) का भी श्री
गणेश कर दिया जाय । काका महाजनी को यह विचार रुचिकर
प्रतीत हुआ । अब मुख्य कठिनाई हरिदास के मिलने की थी, जो
इस शुभ अवसर पर कीर्तन व ईश्वर-गुणानुवाद कर सकें । परन्तु भीष्म ने
इस समस्या को हल कर दिया । उन्होंने कहा कि मेरा स्वरचित राम
आख्यान, जिसमें रामजन्म का वर्णन है, तैयार हो चुका है । मैं
उसका ही कीर्तन करुँगा और तुम हारमोनियम पर साथ करना तथा
राधाकृष्णमाई सुंठवडा़ (सोंठ का शक्कर मिश्रित चूर्ण) तैयार कर
देंगी । तब वे दोनों शीघ्र ही बाबा की स्वीकृति प्राप्त करने हेतु
मसजिद को गये । बाबा तो अंतर्यामी थे । उन्हें तो सब ज्ञान था
कि वाड़े में क्या-क्या हो रहा है । बाबा ने महाजनी से प्रश्न
किया कि वहाँ क्या चल रहा था । इस आकस्मिक प्रश्न से
महाजनी घबडा गये और बाबा के शब्दों से पुछा कि क्या बात है ।
भीष्म ने रामनवमी-उत्सव मनाने का विचार बाबा के समक्ष
प्रस्तुत किया तथा स्वीकृति देने की प्रार्थना की । बाबा ने भी
सहर्ष अनुमति दे दी । सभी भक्त हर्षित हहुये और रामजन्मोत्सव
मनाने की तैयारियाँ करने लगे । दूसरे दिन रंग-बिरंगी झंडियों से
मसजिद सजा दी गई । श्रीमती राधाकृष्णमाई ने एक पालना
लाकर बाबा के आसन के समक्ष रख दिया और फिर उत्सव प्रारम्भ
हो गया । भीष्म कीर्तन करने को खड़े हो गये और महाजनी
हारमोनियम पर उनका साथ करने लगे । तभी बाबा ने महाजनी
को बुलाबा भेजा । यहाँ महाजनी शंकित थे कि बाबा उत्सव
मनाने की आज्ञा देंगे भी या नहीं । परन्तु जब वे बाबा के समीप
पहुँचे तो बाबा ने उनसे प्रश्न किया यह सब क्या है, यह पलना क्यों
रखा गया है महाजनी ने बतलाया कि रामनवमी का कार्यक्रम
प्रारम्भ हो गया और इसी कारण यह पालना यहाँ रखा गया ।
बाबा ने निम्बर पर से दो हार उठाये । उनमें से एक हार तो उन्होंने
काका जी के गले में डाल दिया तथा दूसरा भीष्म के लिये भेज
दिया । अब कीर्तन प्रारम्भ हो गया था । कीर्तन समाप्त हुआ,
तब श्री राजाराम की उच्च स्वर से जयजयकार हुई । कीर्तन के
स्थान पर गुलाल की वर्षा की गई । जब हर कोई प्रसन्नता से झूम
रहा था, अचानक ही एक गर्जती हुई ध्वनि उनके कानों पर पड़ी ।
वस्तुतः जिस समय गुलाल की वर्षा हो रही थी तो उसमें से कुछ
कण अनायास ही बाबा की आँख में चले गये । तब बाबा एकदम क्रुदृ
होकर उच्च स्वर में अपशव्द कहने व कोसने लगे । यह दृश्य देखकर सब
लोग भयभीत होकर सिटपिटाने लगे । बाबा के स्वभाव से भली
भाँति परिचित अंतरंग भक्त भला इन अपशब्दों का कब बुरा
माननेवाले थे । बाबा के इन शब्दों तथा वाक्यों को उन्होंने
आर्शीवाद समझा । उन्होंने सोचा कि आज राम का जन्मदिन है,
अतः रावण का नाश, अहंकार एवं दुष्ट प्रवृतिरुपी राक्षसों के
संहार के लिये बाबा को क्रोध उत्पन्न होना सर्वथा उचित ही है
। इसके साथ-साथ उन्हें यह विदित था कि जब कभी भी शिरडी में
कोई नवीन कार्यक्रम रचा जाता था, तब बाबा इसी प्रकार
कुपित या क्रुदृ हो ही जाया करते थे । इसलिये वे सब स्तब्ध ही रहे
। इधर राधाकृष्णमाई भी भयभीत थी कि कही बाबा पालना न
तोड़-फोड़ डालें, इसलिये उन्होंने काका महाजनी से पालना
हटाने के लिए कहा । परन्तु बाबा ने ऐसा करने से उन्हें रोका । कुछ
समय पश्चात् बाबा शांत हो गये और उस दिन की महापूजा और
आरती का कार्यक्रम निर्विध्र समाप्त हो गया । उसके बात
काका महाजनी ने बाबा से पालना उतारने की अनुमति माँगी
परन्तु बाबा ने अस्वीकृत करते हुये कहा कि अभी उत्सव सम्पूर्ण
नहीं हुआ है । अगने दिन गोपाल काला उत्सव मनाया गया, जिसके
पश्चात् बाबा ने पालना उतारने की आज्ञा दे दी । उत्सव में दही
मिश्रित पौहा एक मिट्टी के बर्तन में लटका दिया जाता है और
कीर्तन समाप्त होने पर वह बर्तन फोड़ दिया जाता है, और प्रसाद
के रुप में वह पौहा सब को वितरित कर दिया जाता है, जिस
प्रकार कि श्री कृष्ण ने ग्वालों के साथ किया था । रामनवमी
उत्सव इसी तरह दिन भर चलता रहा । दिन के समय दो ध्वजों जुलूस
और रात्रि के समय चन्दन का जुलूस बड़ी धूमधाम और समारोह के
साथ निकाला गया । इस समय के पश्चात ही उरुस का उत्सव
रामनवमी के उत्सव में परिवर्तित हो गया । अगले वर्ष (सन् 1912) से
रामनवमी के कार्यक्रमों की सूची में वृदिृ होने लगी । श्रीमती
राधाकृष्णमाई ने चैत्र की प्रतिपदा से नामसप्ताह प्रारम्भ कर
दिया । (लगातार दिन रात 7 दिन तक भगवत् नाम लेना
नामसप्ताह कहलाता है) सब भक्त इसमें बारी-बारी से भागों से
भाग लेते थे । वे भी प्रातःकाल सम्मिलित हो जाया करते थीं ।
देश के सभी भागों में रामनवमी का उत्सव मनाया जाता है ।
इसलिये अगले वर्ष हरिदास के मिलने की कठिनाई पुनः उपस्थित
हुई, परन्तु उत्सव के पूर्व ही यह समस्या हल हो गई । पाँच-छः दिन
पूर्व श्री महाजनी की बाला बुवा से अकस्मात् भेंट हो गी ।
बुवासाहेब अधुनिक तुकाराम के नाम से प्रसिदृ थे और इस वर्ष
कीर्तन का कार्य उन्हें ही सौंपा गया । अगले वर्ष सन् 1913 में श्री
हरिदास (सातारा जिले केबाला बुव सातारकर) बृहद्सिदृ कवटे
ग्राम में प्लेग का प्रकोप होने के कारण अपने गाँव में हरिदास का
कार्य नहीं कर सकते थे । इस इस वर्ष वे शिरडी में आये । काकासाहेब
दीक्षित ने उनके कीर्तन के लिये बाबा से अनुमति प्राप्त की ।
बाबा ने भी उन्हें यथेष्ट पुरस्कार दिया । सन् 1914 से हरिदास की
कठिनाई बाबा ने सदैव के लिये हल कर दी । उन्होंने यह कार्य
स्थायी रुप से दासगणू महाराज के सौंप दिया । तब से वे इस कार्य
को उत्तम रीति से सफलता और विदृतापूर्वक पूर्ण लगन से निभाते
रहे । सन् 1912 से उत्सव के अवसर पर लोगों की संख्या में उत्तरोत्तर
वृदि होने लगी । चैत्र शुक्ल अष्टमी से दृादशी तक शिरडी में लोगों
की संख्या में इतनी अधिक वृदि हो जाया करती थी, मानो
मधुमक्खी का छत्ता ही लगा हो । दुकानों की संख्या में बढ़ती
हो गई । प्रसिदृ पहलवानों की कुश्तियाँ होने लगी । गरीबों को
वृहद् स्तर पर भोजन कराया जाने लगा । राधाकृष्णमाई के घोर
परिश्रम के फलस्वरुप शिरडी को संस्थान का रुप मिला । सम्पत्ति
भी दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी । एक सुन्दर घोड़ा, पालकी, रथ ओर
चाँदी के अन्य पदार्थ, बर्तन, पात्र, शीशे इत्याति भक्तों ने उपहार
में भेंट किये । उत्सव के अवसर पर हाथी भी बुलाया जाता था ।
यघपि सम्पत्ति बहुत बढ़ी, परन्तु बाबा उल सब से सदा साधारण
वेशभूषा घारण करते थे । यह ध्यान देने योग्य है कि जुलूस तथा उत्सव
में हिन्दू और मुसलमान दोनों ही साथ-साथ कार्य करते थे । परन्तु
आज तक न उनमें कोई विवाद हुआ और न कोई मतभेद ही । पहनेपहन
तो लोगों की संख्या 5000-7000 के लगभग ही होता थी । परन्तु
किसी-किसी वर्ष तो यह संख्या 75000 तक पहुँच जाती थी ।
फिर भी न कभी कोई बीमारी फैली और न कोई दंगा ही हुआ ।
मसजिद का जीर्णोदृार
जिस प्रकार उरुस या मेला भराने का विचार प्रथमतः श्री
गोपाल गुंड को आया था, उसी प्रकार मसजिद के जीर्णोदृार
का विचार भी प्रथमतः उन्हें ही आया । उन्होंने इस कार्य के
निमित्त पत्थर एकत्रित कर उन्हें वर्गाकार करवाया । परन्तु इस
कार्य का श्रेय उन्हें प्राप्त नहीं होना था । वह सुयश तो
नानासाहेब चाँदोरकर के लिये ही सुरक्षित था और फर्श का
कार्य काकासाहेब दीक्षित के लिये । प्रारम्भ में बाबा ने इन
कार्यों के लिये स्वीकृति नहीं दी, परन्तु स्थानीय भक्त
म्हालसापति के आग्रह करने सा बाबा की स्वीकृति प्राप्त हो
गई और एक रात में ही मसजिद का पूरा फर्श बन गया । अभी तक
बाबा एक टाट के ही टुकड़े पर बैठते थे । अब उस टाट के टुकड़े को वहाँ
से हटाकर, उसके स्थान पर एक छोटी सी गादी बिछा दी गई । सन्
1911 में सभामंडप भी घोर परिश्रम के उपरांत ठीक हो गया ।
मसजिद का आँगन बहुत छोटा तथा असुविधाजनक था ।
काकासाहेब दीक्षित आँगन को बढ़कर उसके ऊपर छप्पर बनाना
चाहते थे । यथेष्ठ द्रव्यराशि व्यय कर उन्होंने लोहे के खम्भे,
बल्लियाँ व कैंचियाँ मोल लीं और कार्य भी प्रारम्भ हो गया ।
दिन-रात परिश्रम कर भक्तों ने लोहे के खम्भे जमीन में गाड़े । जब
दूसरे दिन बाबा चावड़ी से लौटे, उन्होंने उन खमभों को उखाड़ कर
फेंक दिया और अति क्रोधित हो गये । वे एक हाथ से खम्भा पकड़
कर उसे उखाड़ने लगे और दूसर हाथ से उन्होंने तात्या का साफा
उतार लिया और उसमें आग लगाकर गड्ढे में फेंक दिया । बाबा के
नेत्र जलते हुए अंगारे के सदृश लाल हो गये । किसी को भी उनकी
ओर आँख उठा कर देखने का साहस नहीं होता था सभी बुरी तरह
भयभीत होकर विचलित होने लगे कि अब क्या होगा । भागोजी
शिंदे (बाबा के एक कोढ़ी भक्त) कुछ साहस कर आगे बढ़े, पर बाबा
ने उन्हें धक्का देकर पीछे ढकेल दिया । माधवराव की भी वही गति
हुई । बाबा उनके ऊपर भी ईंट के ढेले फेंकने लगे । जो भी उन्हें शान्त
करने गया, उसकी वही दशा हुई ।
कुछ समत के पश्चात् क्रोध शांत होने पर बाबा ने एक दुकानदार
को बुलाया और एक जरीदार फेंटा खरीद कर अपने हाथों से उसे
तात्या के सिर पर बाँधने लगे, जैसे उन्हें विशेष सम्मान दिया गया
हो । यह विचित्र व्यवहार देखकर भक्तों को आश्चर्य हुआ । वे समझ
नहीं पा रहे थे कि किस अज्ञात कारण से बाबा इतने क्रोधित हुए
। उन्होंने तात्या को क्यों पीटा और तत्क्षण ही उनका क्रोध
क्यों शांत हो गया । बाबा कभी-कभी अति गंभीर तथा शांत
मुद्रा में रहते थे और बड़े प्रेमपूर्वक वार्तालाप किया करते थे । परन्तु
अनायास ही बिना किसी गोचर कारण के वे क्रोधित हो जाया
करते थे । ऐसी अनेक घटनाएँ देखने में आ चुकी है, परन्तु मैं इसका
निर्णय नहीं कर सकता कि उनमें से कौन सी लिखूँ और कौन सी
छोडूँ । अतः जिस क्रम से वे याद आती जायेंगी, उसी प्रकार
उनका वर्णन किया जायगा । अगले अध्याय में बाबा यवन हैं या
हिन्दू, इसका विवेचन किया जायेगा तथा उनके योग, साधन,
शक्ति और अन्य विषयों पर भी विचार किया जायेगा ।
।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।